Mufti Shamail Nadvi vs Javed Akhtar | Atheism vs Religion Debate in Delhi | 20 December 2025
Dec 21, 2025
Mufti Shamail Nadvi vs Javed Akhtar | Atheism vs Religion Debate in Delhi | 20 December 2025
Mufti Shamail Nadvi vs Javed Akhtar | Religion vs Atheism Big Debate in Delhi.
मुफ़्ती शमाइल नदवी बनाम जावेद अख्तर | धर्म बनाम नास्तिकता | दिल्ली में बड़ा डिबेट।
مفتی شمائل ندوی بمقابلہ جاوید اختر | مذہب بمقابلہ الحاد | دہلی مناظرہ۔
মুফতি শামাইল নদভী বনাম জাভেদ আখতার | ধর্ম বনাম নাস্তিকতা | দিল্লি বিতর্ক।
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Note:
This video is made only for informational / educational purposes.
The content used in this video belongs to its respective owner.
Credit:
[Mufti Shamail Nadwi]
Original Video: https://www.youtube.com/live/pythOMyPcHw?si=YPX9dmORKKwB_vfx
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📝 Description
A historic and highly anticipated debate on Religion vs Atheism took place in Delhi on 20 December 2025.
This epic showdown featured Mufti Shamail Abdullah Nadvi and Javed Akhtar, discussing deep questions about faith, belief, and the existence of God.
The debate was held in Delhi and drew massive attention from across the country.
In this full video, you will watch strong arguments, logical reasoning, and powerful points from both sides in a respectful and intellectual discussion.
👉 Watch the complete debate and decide for yourself.
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0:02
मिनट का वक्त एक बार फिर से दिया जाएगा अपने क्लोजिंग आर्गुममेंट के लिए और उसके
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बाद जो इस बहस के लिए सबसे जरूरी चीज है कि आप और हम और इंटरनेट पर देख रहे लाखों
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करोड़ों लोग उनके सवाल जवाब होंगे तो आप लोग जो यहां मौजूद हैं आपके हम कुछ सवाल
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लेने की कोशिश करेंगे। 30 मिनट का वक्त हमने उसके लिए तय कर रखा है। किस तरह से
0:26
यह 2 घंटे की बहस पूरी होगी? दो तीन बुनियादी बातें हैं जिनका हमें ध्यान रखना
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है। किसी भी किस्म की नारेबाजी में हमें शरीक नहीं होना है। यह हल्लागुल्ला नहीं
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है क्योंकि पूरी दुनिया देख रही है तो एक नज़र कायम करनी है। एक उदाहरण लोगों के सामने रखना है कि पढ़े लिखे लोग इत्तेफाकी
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और नाइत्तेफाकी रखते हुए भी एक दूसरे से सहमति और असहमति रखते हुए भी बात कह सकते हैं। यहां पर मेरे जेएनयू के प्रोफेसर
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बैठे हैं पुरुषोत्तम अग्रवाल जी जिन्होंने हमें क्लास में सिखाया है कि सहमति का
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साहस और असहमति का विवेक और इसका ठीक उलट भी यह बड़ा जरूरी है।
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दूसरी बात यह किसी एक धर्म के बारे में बहस नहीं है। यह बात सबको स्पष्ट होनी
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चाहिए। किसी धर्म को महान बताने या किसी धर्म को कमतर बताने की यह बहस नहीं है। तो
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यदि कोई इस उम्मीद से देख रहा है या यहां आया है तो मैं आपको आश्वस्त करना चाहता
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हूं कि आपको ना उम्मीद ही हाथ लगेगी। इस बहस में बहुत ज्यादा धार्मिक प्रतीकों
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के इस्तेमाल को लेकर भी यह दोनों लोग जो अभी आपको गंभीर दिख रहे हैं भले लोग हैं। कल शाम को चाय पर मिले थे। बहुत हंसीज़ाक
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भी इनके बीच हुआ था और गलवैया डालते हुए एक तस्वीर भी हुई थी। यह इस बात का प्रमाण
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है कि इंटरनेट पर जो हल्ला मचा हुआ है उसके मुकाबले यह दोनों लोग बहुत ही अच्छे
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शांत ढंग से बहस के लिए राजी हो गए हैं। Twitter की बातें Twitter तक सीमित एलन
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मस्क आजकल उसको एक्स कहते हैं और अब इस बहस की शुरुआत मैं इन विद्वानों
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का हालांकि इनको परिचय की जरूरत नहीं है पर हो सकता है। हमें पत्रकारिता में सिखाया जाता है कि नेवर अस्यूम विज्ञान भी
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यही कहता है। मुफ्ती शमाल नदवी साहब इस्लामिक विद्वान शिक्षाविद हैं। कोलकाता के वाहन फाउंडेशन के संस्थापक हैं। लखनऊ
2:21
की प्रतिष्ठित दारुल उलूम नदतुल उलमा से ग्रेजुएशन किया है। सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर अध्यापन और बौद्धिक
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कामों में सक्रिय हैं। और इस समय इंटरनेशनल इस्लामिक यूनिवर्सिटी मलेशिया से पीएचडी कर रहे हैं। अच्छी बात यह है कि
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पढ़ाई के साथ-साथ ट्रेवल ब्लॉग भी बनाते हैं। पेट्रोनर्स टावर के सामने का ब्लॉग हमने देखा।
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हमारे साथ जावेद अख्तर साहब हैं। जावेद अख्तर साहब कवि हैं, शायर हैं। गद्य भी
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लिखते हैं। फिल्मों के लिए संवाद लिखे हैं। गीत लिखे हैं। इससे इत
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वैज्ञानिक सोच को लेकर या अपने डिक्लेयर्ड एथिज्म को लेकर भी मुखरित रहते हैं और
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अपने तई रैशनलिटी की बात करते हैं। देवियों और सज्जनों डस गॉड एकिस्ट? इस
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सवाल का जवाब सब अपने-अपने त खोजने की कोशिश कर रहे हैं। कोई इसको गॉड डम
3:14
पार्टिकल की खोज बताता है। कोई गॉड पार्टिकल की खोज बताता है। कोई हिक्स बोसान की खोज बताता है। कोई यह सवाल जवाब
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तलाशने की कोशिश करता है कि मास एग्जिस्टेंस में आखिर आया कैसे? हुआ क्या था? सृष्टि के पहले, समय के पहले क्या था?
3:29
और कोई यह कहता है कि ये सारी खोजें जिस मस्तिष्क में हो रही है, प्रकृति के क्रम में वो कैसे विकसित हुआ? मैं उम्मीद करता
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हूं कि हम आज इन बुनियादी सवालों के कुछ जवाब हासिल करने में कामयाब हो। मैं सबसे
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पहले मंच पर आमंत्रित कर रहा हूं मुफ्ती शमाल नदवी साहब को। आइए सर।
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जी
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आप एक आपसे गुजारिश बोलना शुरू करें। आप लोग प्लीज अपने फोन लाइट मोड पे या
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साइलेंट मोड पे रख एक बार चेक कर ले कई बार बेहानी हो जाती है।
4:20
तमाम तारीफें उस क्रिएटर के लिए जिसने इस यूनिवर्स को एक मकसद के तहत पैदा किया है।
4:26
रिस्पेक्टेड जनाब जावेद अख्तर साहब, मिस्टर सौरभ द्विवेदी और रिस्पेक्टेड ऑडियंस थैंक यू ऑल फॉर बीइंग हियर टुडे।
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आज की डिबेट में क्योंकि हम बात करने वाले हैं डस गॉड एकिस्ट के टॉपिक पर। तो यह एक
4:41
ऐसा टॉपिक है जिसके मुतालिक कोई भी डिसीजन लेने के लिए अलग-अलग स्टैंडर्ड्स हो सकते
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हैं। लिहाजा डिबेट के शुरू में यह जरूरी है कि हम यह जान लें कि आज के इस टॉपिक
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में कौन सा स्टैंडर्ड सही होगा और कौन सा गलत होगा। सबसे पहला स्टैंडर्ड जिसे मैं
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समझता हूं कि हमारे रिस्पेक्टेड जनाब जावेद अख्तर साहब बड़ी तेजी के साथ उसकी तरफ लपकेंगे वो है साइंस। जबकि साइंस
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दर हकीकत खुदा के एग्जिस्टेंस को डायरेक्टली साबित करने या उसके
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एक्जिस्टेंस को डिनाई करने के लिए स्टैंडर्ड नहीं बन सकती। और उसकी वजह क्या
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है? ये मैं नहीं कह रहा। ये वो लोग कह रहे हैं जो साइंस के एक्सपर्ट्स हैं। नेशनल
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एकेडमी ऑफ साइंस कहती है। साइंस डजंट हैव
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द प्रोसेससेस टू प्रूव और डिस्रूव द एक्जिस्टेंस ऑफ़ गॉड। व्हाई? क्योंकि साइंस
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का ताल्लुक एंपेरिकल एविडेंस से है और एंपेरिकल एविडेंसेस का ताल्लुक हमारे
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नेचुरल और फिजिकल वर्ल्ड से है। जबकि गॉड नॉन फिजिकल और सुपर नेचुरल रियलिटी है।
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लिहाजा नॉन फिजिकल रियलिटी को आप उस टूल के साथ नहीं चेक कर सकते जिसका काम फिजिकल
5:58
रियलिटी को तलाश करना है। लिहाजा आज इस डिबेट में गॉड की एक्जिस्टेंस को साबित
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करने या उसे डिनाई करने में साइंटिफिक एविडेंस को एक्सेप्ट नहीं किया जाएगा।
6:11
दूसरा स्टैंडर्ड हो सकता है रेवेलेशन कि रेवेलेशन के जरिए हम यह साबित करें कि गॉड
6:18
एक्सिस्ट करता है या नहीं। लेकिन ये स्टैंडर्ड भी आज इररेिलेवेंट है। क्यों?
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क्योंकि रेवोलेशन मेरे नजदीक सोर्स ऑफ नॉलेज है। वैलिड सोर्स ऑफ नॉलेज है। लेकिन
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हमारे जावेद अख्तर साहब के नजदीक ये वैलिड सोर्स ऑफ नॉलेज नहीं है। लिहाजा आज की डिबेट में मैं एक भी एविडेंस किसी भी
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मजहबी स्क्रिप्चर से नहीं दूंगा। ताकि जावेद अख्तर साहब के लिए वो अनएक्सेप्टेबल
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ना हो। तीसरा जो मेरार हो सकता है वो है ऑब्जरवेशन। के भाई कोई कहे कि हमें खुदा
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दिखाओ। अगर है तो दिखाओ। या ये कि खुदा के एक्सिस्टेंस पर एंपेरिकल एविडेंस दो। तो
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ये है दर हकीकत गलत टूल का इस्तेमाल करना। ये ऐसा ही है कि जावेद साहब मुझसे ये
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मुतालबा करें कि मुफ्ती साहब आप मेटल डिटक्टर के जरिए प्लास्टिक डिटेक्ट करके दिखाएं। अबकि प्लास्टिक डिटेक्ट नहीं हो
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पा रही है। लिहाजा प्लास्टिक डज नॉट एक्सिस्ट। नो यू आर यूजिंग द रोंग टूल। इस
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टूल से प्लास्टिक को डिटेक्ट नहीं किया जाता। लिहाजा मैं समझता हूं कि गॉड के एकिस्टेंस पर
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एंपेरिकल एविडेंस का मुतालबा करना एक बचकाना मुतालबा है और हमारे रिस्पेक्टेड
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जनाब जावेद अख्तर साहब इस स्टेज से अब बहुत आगे निकल चुके हैं। अब बचता है एक ही
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स्टैंडर्ड। और वो स्टैंडर्ड है अकल। लॉजिक
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रीजनिंग। और यही वो स्टैंडर्ड है जिसके तहत गॉड के एग्जिस्टेंस को साबित किया
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जाएगा या गॉड की एग्जिस्टेंस को डिनाई किया जाएगा। लेकिन क्योंकि ये बहुत
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इंपॉर्टेंट और सेंसिटिव टॉपिक है। इसलिए लॉजिकल आर्गुमेंट भी ऐसा होना चाहिए जो
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डेफिनेटिव हो। इनडेफिनेटिव ना हो जो दो और दो चार की तरह बिल्कुल वाज़ हो। जिसे
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लॉजिकली रिजेक्ट करना पॉसिबल नहीं हो। फॉर एग्जांपल हम कहें हमारे रिस्पेक्टेड मिस्टर सौरभ साहब ये एक इंसान है और तमाम
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इंसान कॉन्शियस बीइंग है लिहाजा नतीजा क्या निकला हमारे सौरभ साहब भी कॉन्शियस
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बीइंग है क्या ये इनडेफिनेट आर्गुमेंट है या डेफिनेट आर्गुमेंट है ये डेफिनेट आर्गुमेंट है ये दो और दो की तरह वाज़ है
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इसमें किसी तरह जो है लॉजिकली इसको रिजेक्ट नहीं किया जा सकता तो अगर आज
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हमारे जावेद अख्तर साहब ऐसी कोई अकली दलील और लॉजिकल एविडेंस दें खुदा के ना होने पर
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जो डेफिनेट भी हो तो मैं यह ऐलान करता हूं कि यकीनन मैं उस एविडेंस को कबूल करूंगा
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और उस पर गौर करूंगा। लेकिन साथ में यह भी ऐलान कर देता हूं प्रेडिक्शन के तौर पर कि ऐसा कोई डेफिनेट आर्गुमेंट कोई नहीं पेश
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कर सकता। दलील हम देंगे और डेफिनेटिव दलील
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देंगे। लॉजिकल दलील देंगे। ऐसी दलील देंगे जो एंटायर एथिस्टिक वर्ल्ड उसे रेफ्यूट
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नहीं कर सकती। चल अब हम एक एग्जांपल सोचते हैं। एक सिनेरियो सिंपल सिनेरियो तमाम
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ऑडियंस से गुजारिश है। हम और आप एक आइसोलेटेड आइलैंड पर हैं। ऐसा आइलैंड जहां
9:12
पे हमसे पहले कोई कभी नहीं गया। चलते-चलते आपके सामने अचानक आपने देखा एक पिंक कलर
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की बॉल पड़ी हुई है। सबसे पहला सवाल आपके ज़हन में क्या आएगा? कि ये बॉल यहां क्यों
9:23
आई? कैसे आई? ये पिंक कलर की ही क्यों है? कोई और कलर भी हो सकता था। ये इसी शेप में
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क्यों है? कोई और शेप भी हो सकता था। नेचुरली आप इस तरफ पहुंचेंगे कि कोई ना
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कोई है जिसने इन स्पेसिफिक प्रॉपर्टीज के साथ इस बॉल को बनाया है और यहां पे रखा
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है। चूकि आप जानते हैं कि ये जो बॉल है इसका एग्जिस्ट करना जरूरी नहीं है। ये
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एग्जिस्ट कर भी सकती थी नहीं भी कर सकती थी। और एग्ज़िस्ट करना ही था तो किसी और फॉर्म में करती। किसी और कलर में करती। अब
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आप इस बॉल को एक्सपेंड करते चले जाएं, एक्सपैंड करते चले जाएं, एक्सपैंड करते चले जाएं। यहां तक कि ये बॉल यूनिवर्स के
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साइज की हो जाए। बताइए कि क्या साइज साइज के बढ़ जाने से सवाल बदल जाएगा? हरगिज़ नहीं बदलेगा। अभी भी सवाल रहेगा। ये
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यूनिवर्स कहां से आया? इन स्पेसिफिक प्रॉपर्टीज के साथ कहां से आया? क्यों आया? किसने बनाया? ये सवाल उस वक्त भी
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वैलिड रहेगा। लेकिन यह सवाल अगर हम जनाब जावेद अख्तर
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साहब से करें तो क्योंकि इनका वर्ल्ड व्यू एथिस्टिक है और सिर्फ इनका नहीं मतलब जितने भी एथिस्ट हैं और एथिस्टिक वर्ल्ड
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व्यू को रखने वाले से अगर आप यह सवाल करें कि ये यूनिवर्स कहां से आया तो इनका जवाब
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या तो आर्गुमेंट फ्रॉम इग्नोरेंस होगा या डॉग्मैटिक होगा। या तो यह कहेंगे कि मुझे
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नहीं पता कि यह कहां से आया। लिहाजा गॉड डज नॉट एक्सिस्ट। ये आर्गुमेंट फ्रॉम इग्नोरेंस है। या ये कहेंगे कि ये
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यूनिवर्स खुद ब खुद बन गया। इसका मतलब ये है कि उस बॉल को भी खुद ब खुद बन जाना चाहिए। लेकिन बॉल के ताल्लुक से ये
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एक्सप्लेनेशन एक्सेप्ट नहीं की जाएगी कि ये खुद ब खुद बन गई। लेकिन यूनिवर्स के ताल्लुक से कर दिया जाएगा। इसे हम दूसरे
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अल्फाज़ में डॉगमा भी कह सकते हैं। दूसरी चीज हमारे जावेद अख्तर साहब जरूर गॉड ऑफ
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गैप्स की मिसाल भी जरूर देंगे। और मिसाल देंगे कि पहले जमाने में बिजलियां कड़कती थी तो लोगों ने किसी एक खुदा की तरफ और
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बारिश होती थी तो दूसरे खुदा की तरफ मंसूब कर दिया। उनके पास दलील नहीं थी। ये हमारा वर्ल्ड व्यू है ही नहीं। ये हमारा वर्ल्ड
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व्यू है ही नहीं। क्योंकि नेचुरल फेनोमिना के प्रोसेस की इंटरप्रिटेशन को जान लेने
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से ये कहां से साबित हो गया कि गॉड एक्सिस्ट नहीं करता है। इस पर मैं इंशाल्लाह अभी आगे बात करूंगा। आप हजरात
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यह भी देखेंगे और मैं यह एक्सपेक्ट करता हूं कि हमारे रिस्पेक्टेड जनाब जावेद अख्तर साहब जरूर इमोशनल आर्गुमेंट्स भी
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देंगे जो कि एक लॉजिकल फैलेसी है जब बात आती है ट्रुथ को डिसाइड करने में। क्यों?
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मिसाल के तौर पर वो कहेंगे कि अगर गॉड है तो इविल क्यों एक्सिस्ट करता है? जबकि मैं कहता हूं इविल का एक्सिस्ट करना गॉड के
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एक्सिस्ट एग्जिस्ट करने की दलील है उसके खिलाफ नहीं है। चूंकि अगर गॉड है तो हम सब उसके सामने अकाउंटेबल हैं और अगर हम
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अकाउंटेबल हैं तो अकाउंटेबिलिटी के लिए इविल का मौजूद होना जरूरी है। उसके बगैर हम अकाउंटेबल नहीं हो सकते। और अगर हम
12:07
अकाउंटेबल नहीं हैं तो हम जनाब जावेद अख्तर साहब से पूछेंगे कि आप बताएं कि फिर सफरिंग इस दुनिया में क्यों है? अगर खुदा
12:14
नहीं है तो सफरिंग क्यों है? और उन लोगों के जज्बे का क्या जिनके अंदर सफरिंग के के
12:20
बाद इंतकाम लेने का जज्बा पाया जाता है और वो इस दुनिया से ऐसे ही चले गए। क्या उनकी सारी तकलीफें बेकार चली जाएंगी? अब आ जाए
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उसी एग्जांपल की तरफ के बॉल मुझसे अगर कोई पूछे इस बॉल को किसने बनाया और या इस
12:32
एक्सपेंडेड बॉल को किसने बनाया? मैं कहूंगा कि चूंकि ये यूनिवर्स और इस यूनिवर्स की तमाम चीजें कॉन्टिंजेंट हैं।
12:39
कॉन्टिंजेंट होने का मतलब ये होता है कि जो अपने एक्सिस्टेंस पे किसी के ऊपर डिपेंड करती हो। तो जाहिर है ये यूनिवर्स
12:46
कॉनंटिंजेंट है। और अगर कोई चीज कॉनंटिंजेंट नहीं है तो मैं रिक्वेस्ट करूंगा कि मुझे दिखा दें कि कौन सी चीज
12:52
यूनिवर्स में कंटिंजेंट नहीं है। हम भी जरा गौर कर लें और हम भी देख लें। और जब कंटिंजेंट चीजें मौजूद हैं तो फिलॉसोफर्स
12:59
की इस्तिलाह के मुताबिक हम उस टर्मिनोलॉजी के मुताबिक हम उस जगह तक पहुंचते हैं और
13:05
उस हस्ती तक पहुंचते हैं जिसे नेसेसरी बीइंग कहा जाता है कि ये वो नेसेसरी बीइंग है जिसका मौजूद ना होना नामुमकिन हो।
13:12
चूंकि अगर ये मौजूद ना हो तो सारी चीजें एकिस्टेंस में आएंगी ही नहीं। और ये सारी डिप कंटिंजेंट चीजें उसी के ऊपर डिपेंड
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करती हैं। अब अगर आप ये सवाल करते हैं कि फिर उस हस्ती को किसने बनाया? फिर उसका कॉज क्या है? फिर उसका कॉज क्या है? फिर
13:25
उसका कॉज क्या है? और एंडलेसली चले जाएं। इसे हम कहते हैं इनफिनिट रिग्रेस ऑफ़ कॉजेज़ जो कि लॉजिकल फैलेसी है। कॉनसेप्चुअली
13:33
इंफिनिटी पॉसिबल है। मिसाल के तौर पे न्यूमेरिकल्स वन टू थ्री गिनते चले जाएं। इनफिनिट नंबर्स हैं। मैं कॉनसेप्चुअली बात
13:40
नहीं कर रहा। प्रैक्टिकली रियलिटी में साबित करके दिखाएं कि इनफिनिट रिग्रेस ऑफ़ कॉजेस पॉसिबल है या नहीं। अगर पॉसिबल है
13:46
तो हम मान लेंगे। मिसाल दे दें और पॉसिबल नहीं है तो एक ही ऑप्शन बचता है जिसे हम कहते हैं नेसेसरी बीइंग। ऐसी नेसेसरी
13:53
बीइंग जो इंडिपेंडेंट है। चूंकि अगर वो डिपेंडेंट हुई तो वो नेसेसरी नहीं रहेगी। ऐसी इंडिपेंडेंट बीइंग जो इटरनल है। अगर
14:00
वो इटरनल नहीं होगी उसकी बिगिनिंग होगी तो वो खुद कंटिंजेंट है। ऐसी बीइंग जो पावरफुल है। क्योंकि कॉन्टिंजेंट को
14:06
एक्चुअलाइज करने के लिए पावर चाहिए। ऐसी बीइंग जो इंटेलिजेंट है और नॉलेजेबल है।
14:11
क्योंकि ये यूनिवर्स स्पेसिफिक फॉर्म और स्पेसिफिक लॉज़ ऑफ नेचर के तहत प्रिसाइजली
14:17
चल रहा है। थैंक यू। थैंक यू साहब।
14:22
मैं इन दलीलों के बाद जावेद अख्तर साहब से गुजारिश करूंगा। आप बैठ के बोलना चाहेंगे?
14:28
जी।
14:39
पहले तो मैं मुफ्ती साहब को एक अच्छी खबर देना चाहूंगा कि मेरी नॉलेज साइंस के बारे
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में बड़ी मामूली है। तो आप फिक्र ना करें उसकी। लेकिन कुछ कॉमन सेंस है मुझ में।
14:51
देखिए ये खुदा का तसवुर कोई नया तसवुर नहीं है। ये सदियों से रहा है। ये कुछ
14:59
रिलजन 3000 साल पुराने होंगे। 4000 साल पुराने होंगे। लेकिन इंसान कोई 10,000
15:05
12000 साल से एकिस्ट करता है होमोसेपियर की शक्ल में और हमेशा कुछ ना कुछ मजहब
15:12
रहे। ये मजहब जाहिलों के नहीं थे। यह मजहब एक
15:17
ऐसी ग्रीक सोसाइटी के थे जहां बड़े-बड़े फिलॉसफर पैदा हुए। ये मजहब इजिपशियंस के
15:25
थे जिन्होंने पिरामिड्स बनाए थे। ये रोमंस के थे कि जिनका आर्किटेक्चर और सेनेट यानी
15:32
पहली बुनियाद डेमोक्रेसी थी। लिमिटेड थी मगर डेमोक्रेसी थी। ये उन लोगों ने किए
15:38
थे। तो इनका जो जुपिटर था, रास
15:44
था। उन्हें उस पर इतना ही एतमा था जितना आज किसी मजहबी आदमी को अपने खुदा पर होगा।
15:51
क्रिश्चियनिटी आने से पहले यूरोप में एक मजहब था जर्मेनिक रिलीजन। उसका एक खुदा
15:59
था। उसकी एक बीवी थी। उसके दो बेटे थे। एक बेटी थी। फिर जर्मनी में जब यूरोप में
16:06
क्रिश्चियनिटी आई तो वो खुदा उसकी बीवी और पूरे खानदान चला गया।
16:12
तो हमने अगर हम हिस्ट्री देखें तो खुदा जो है वो ज्यादातर फनी है। वो हमेशा रहे नहीं
16:22
और वो जो लोग इन्हें मानते थे उनको आप कहे वो तो जाहिल थे। उन्हें तो कुछ पता ही नहीं था। ऐसा नहीं है। वो अपने वक्त में
16:29
बड़े काबिल लोग थे। और अपने वक्त में उन्होंने बड़े-बड़े काम किए हैं। फिलॉसफर
16:35
थे, साइंटिस्ट थे। लेकिन उनका मजहब कहां गया? उनके खुदा कहां गए? आज जो खुदा हैं
16:43
दुनिया में लोग उन्हें मानते हैं। आपको क्या मालूम कि कितने बरसों के बाद क्या होने वाला है? हम यूरोप में देखते हैं तो
16:49
चर्च खाली है। तो व के साथ चीजें बदलती हैं। जहां तक इसका ताल्लुक है मजहबों का
17:00
हर मजहब आपसे एक चीज मांगता है। फेथ।
17:05
ये फेथ क्या चीज होती है? व्हाट इज द डिफरेंस बिटवीन फेथ एंड बिलीफ?
17:12
यह कोई यह तो बहुत ही अहमखाना बात होगी कि कोई आदमी कहे साहब अगर खुदा है तो मुझे दिखाइए। ये तो जाहिला बात हुई। मैंने तो
17:20
नॉर्थ पोल नहीं देखा है। मगर मैं मानता हूं कि नॉर्थ पोल है। मैं क्यों मानता
17:25
हूं? इसलिए कि अगर ये दुनिया रहेंगे तो उसका कोई टॉप होगा। कुछ लोग हैं जो वहां
17:31
गए भी हैं। कॉमन सेंस कहता है कि ऐसा होगा। सबूत है, गवाह है, रीजन है। तो यह
17:38
मेरा फेथ नहीं है। तो फेथ में और बिलीफ में डिफरेंस क्या है? जो मजहब मांगता है
17:46
आपसे हर मजहब फेथ मांगता है। फेथ का मतलब ये है कि ना कोई गवाह हो, ना कोई सबूत हो,
17:53
ना कोई रैशन हो, ना कोई लॉजिक हो, ना कोई प्रूफ हो। मगर तुम एक बात को मानो। ये है
18:00
फेथ। वरना बिलीफ होता। अगर इसमें कुछ भी सबूत
18:05
होते, गवाह होते तो फिर इसे आप बिलीफ कहते। जैसे मेरा बिलीफ है कि नॉर्थ पोल
18:10
है। मेरा फेथ थोड़ी है। फेथ इन तमाम शर्तों को रद्द करता है।
18:19
तो फिर स्टुपिडिटी क्या है? अगर मैं एक बात ऐसी मानू जिसकी ना कोई
18:24
लॉजिक है, ना कोई रैशन है, ना कोई प्रूफ है, ना कोई गवाह है,
18:32
ना कोई सबूत है और मैं उसे मानूं। तो ये सुपिडिटी हुई। इसे वही कल को मैं यकीन कर
18:39
लूं कि ईलॉन मस्क जो है मेरा भाई है। तो मुझे इंतहाई खुशी होगी। सुकून भी बहुत
18:44
मिलेगा मुझे। लेकिन और कहे भाई क्यों मानते हो? क्या सबूत है वो तो अमेरिकन है
18:50
और तुम तो इंडियन हो। वो तो नस्ल अलग है। तुम्हें कभी मिले भी नहीं। साहब देखिए ये मेरा फेथ है। इस पे बात कीजिए। फेथ का
18:58
मतलब ही यह है कि आप प्रूव नहीं कर सकते। अगर आप प्रूव कर सकते हो तो फेथ की जरूरत
19:04
ही नहीं है। फिर तो आप बात करेंगे। आप कितनी बहस कर लीजिए। अल्टीमेटली दुनिया का
19:10
हर मजहब फेथ पे टिका है। और फेथ का मतलब है एक ऐसा यकीन जिसका कोई सबूत, कोई गवाह,
19:16
कोई रैशन नहीं। अब आप ये कहें कि आप ये क्यों कह रहे हैं
19:23
कि साहब यह कायनात किसने बनाई? कमाल ये है कि आपने बताया कि एक आइलैंड पे गए और एक
19:31
बॉल देखी। आपने ये नहीं कहा कि आइलैंड किसने बनाया?
19:36
आपको सिर्फ बॉल पे हैरत हुई। हमने आइलैंड पे हमने हैरत नहीं की। होते
19:42
हैं आइलैंड। इसी तरह ये आइलैंड है। सितारे ये गैलेक्सीस ये सब आइलैंड्स हैं। खलम है।
19:50
हम उन्हें टेकन फॉर ग्रांटेड लेते हैं। हम पूछते नहीं किसने बनाए? आपने जजीरे के बारे में नहीं पूछा। है
19:58
मेरी पैदाइश कैसे हुई? क्या मैं प्लंड पैदा हुआ था? आई वास प्लंड
20:05
टू बी बोर्न। या एक लकी स्पम था जो किसी अक्ष से चिपक गया।
20:12
मेरी पैदाइश रैंडम रेंडम और इंसाफ जिसे आप कहते हैं इंसाफ का तो
20:20
नेचर से कोई वास्ता ही नहीं है। जो आप कहते हैं कि एक दिन इंसाफ मिलेगा। इंसाफ
20:26
इज अ ह्यूमन कासेप्ट। नेचर में कोई इंसाफ नहीं। अगर शेर हिरण को खा जाता है तो उसे
20:33
कोई सजा नहीं मिलती। अगर एक आंधी आती है और हरेभरे पेड़ों को
20:38
उखाड़ के फेंक देती है तो आंधियों की जेल नहीं होती है। नेचर में इंसाफ नहीं है। इसलिए बोलते नेचर
20:47
को इंसाफ की जरूरत भी नहीं। नेचर तमाम एक है। अब हम कहे कि साहब ये देखिए जो मैंने
20:53
खाना खाया था कि मेरी आंखों ने यूं कर दिया उसे तो इसे सजा मिलने नहीं। वो
20:58
सिस्टम है ऐसे ही चल रहा है। नेचर बगैर इंसाफ के है। इंसाफ इज अ ह्यूमन
21:06
कासेप्ट। तो जो आपसे कहता है कि मैं तुम्हें इंसाफ दूंगा वो इंसानी बहन की
21:12
पैदावार है। ये नेचुरल है ही नहीं। ये आसमानी है ही नहीं। नेचर का तसवुर है।
21:20
इंसाफ का तसवुर। भाई आप साथ मिलते हैं। अब आप लेफ्ट हैंड राइट कर देना। ये क्या है?
21:27
तमाम सच, तमाम नेकी, तमाम शराफत लेफ्ट हैंड राइट है। वरना क्या होगा? या तो आप
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कॉस कर देंगे, आपका एक्सीडेंट हो जाएगा या आप किसी को मार देंगे या ट्रैफिक जाम हो
21:39
जाएगा। झूठ, बेईमानी, रिश्वतखोरी ये तमाम जो है ड्राइविंग ऑन द राउंड साइड है। इसके
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ऊपर कुछ नहीं। ये तो हमने बनाया है। जैसे हमने लेफ्ट हैंड ड्राइव बनाई है। ये
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कांसेप्ट ऑफ इंसाफ जो है ये हमारा है। इसका नेचर से कोई वास्ता नहीं। शेर खा
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जाता है हिरन को उसे जेल होती है क्या? कुछ भी है ही नहीं।
22:05
तो ये जो दुनिया के रिलीजंस प्रॉमिस करते हैं आपसे इंसाफ इसी से मालूम होता है कि
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ये मैनमेंट है। ये तसवुर कहीं और का है ही नहीं। जो नेचर है कुछ लोग कहते हैं नेचर
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ही खुदा है। तो नेचर में तो इंसाफ नहीं कहीं। और आप वादा कर रहे हैं कि तुम्हें मरने के
22:26
बाद इंसाफ मिलेगा। मुझे अगर मिलेगा तो मैं बहुत खुश हूंगा।
22:31
लेकिन मैं यकीन नहीं कर पाता हूं। इसलिए कि मैं फेथ नहीं पैदा कर सकता। द वेरी
22:39
फैक्ट दैट रिलीजंस डिमांड फेथ। इसका मतलब है कि उनके पास जस्टिफिकेशन
22:47
नहीं है। अच्छा था। फिर
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रिलीजन अगर मॉडरेशन में है कोई सा भी वो आप में कुछ खूबियां भी पैदा करता होगा।
22:59
देखिए उससे ये फायदा है वो फायदा है। अल्कोहल जो है
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वो ज्यादातर दवाओं में यूज़ होती है। और एक सर्वे किया गया था अमेरिका में कि
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लोंगिटिविटी किन लोगों की है? तो एक तरफ वो लोग थे जो शराब पीते ही नहीं थे और एक
23:16
तरफ वो थे जो एक बोतल शराब पीते थे। सबसे ज्यादा लंबी उम्र उनकी है जो दो पैक नाप
23:23
के शराब पीते हैं और खाना खाते हैं। मगर हम शराब को बुरा समझते हैं। मैं भी
23:29
बुरा समझता हूं। क्यों? ऐसा होता नहीं।
23:34
कुछ चीजों में आदत होती है जो बढ़ती है। आज तक में एक आदमी दूध पीता है। आप 10 साल
23:40
बाद भी मिलेंगे तो एक ही गिलास पीता होगा। ऐसा नहीं होता सुबह से दूध पीता रहता है।
23:47
मिल्कोहलिक मैंने नहीं देखे। अल्कोहलिक होते हैं। ये टेंडेंसी है मजहब की कि वो
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बढ़ता है। जैसे कैंसर बढ़ता है। जैसे शराब बढ़ती है।
24:01
कुछ लोग होंगे जो उसे सही तरह से यूज़ करते हैं। मुझे यकीन है कि हमारे मुफ़्ती साहब
24:07
भी उनमें से एक हैं। बहुत खुशी हुई मुझे इनसे मिलके। लेकिन कितने लोग हैं कि आज आप देखते हैं दुनिया में जो तबाहया है इनमें
24:14
कितना हाथ है उन लोगों का जो बिलीवर कहते मजहब ये नहीं कहता ना कहता होगा मगर जब ये
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मजहब पीते हैं तो ऐसे बिहेव करते हैं थोड़ा सा अगर हो तो शायद बहुत अच्छी बात
24:27
है लेकिन शराब थोड़ी सी नहीं रहती उसमें टेंडेंसी है पहले थोड़ा सा अगर दो तीन
24:34
कैंसर के सेल हो ना बॉडी में तो आदमी स्लिम रहता लेकिन वो दो तीन सेल नहीं रहते
24:39
वो मल्टीप्लाई होते हैं। जावेद साहब टाइम पूरा हो गया। टाइम हो गया। बस बात खत्म हो गई। अच्छा
24:44
मुझे कुछ और कहने को था भी नहीं।
24:50
जी मैं पहले जवाबी दौर के लिए इनवाइट कर रहा हूं मुफ्ती साहब को। योर रिबटल राउंड
24:56
वन। यू हैव से मिनट्स।
25:04
थैंक यू वेरी मच जावेद साहब। आपकी बात को सुनकर बड़े महजूस हुए हैं हम लोग। महसूस
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डू यू अंडरस्टैंड वी एंजॉय ओके अब थोड़ा सा लॉजिकली उसको हम लोग दरअसल हम लोगों ने कल गुजारिश की थी
25:15
मुफ्ती साहब से भी जावेद साहब से भी कि हिंदुस्तानी जबान आम फहम सबको समझ में आ जाए और जहां कहीं आप मुश्किल शब्द
25:22
इस्तेमाल करें वहां बताते भी चलें थैंक यू तो सबसे पहले हमारे रिस्पेक्टेड जावेद
25:28
साहब ने हवाला दिया कि खुदा फानी है कितने मजहब आ गए चले गए किसी ने जुपिटर को खुदा
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माना किसी ने किसी को माना मैं कहता हूं जिसने कॉन्टिंजेंट चीज को खुदा माना गलत माना वो खुदा है ही नहीं वो खुदा ही नहीं
25:39
है। हम तो नेसेसरी बीइंग को साबित करने बैठे हैं। वो नेसेसरी कॉज जो इटरनल है जो जो
25:47
अबदी भी है और अजली भी है। हम किसी और को साबित करने नहीं बैठे। दूसरी चीज़, उन्होंने कहा कि फेथ एंड बिलीफ ये एक
25:58
ऐसी डेफिनेशन है फेथ की जो इन्होंने पहली मर्तबा पेश की है या माफ़ कीजिएगा इन्होंने
26:03
पहली मर्तबा पेश नहीं की है। रिचर्ड डॉकिंस ने पहली मर्तबा पेश की है। मुझे मालूम है ये सोर्स कहां से है।
26:08
एपिस्टेमोलॉजिकली फेथ और बिलीफ का फर्क आप इस तरह नहीं कर सकते सर। फेथ सही भी होता है, गलत भी होता
26:16
है। बिलीफ सही भी होता है, गलत भी होता है। जो लॉजिक रीजन और एविडेंस से बैक्ट
26:22
होगा वो फेथ सही होगा। और आप जिस फेथ की बात कर रहे हैं कि इलॉजिकल है और उसके
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पीछे नहीं है तो वी आर ऑन द सेम पेज। हम नहीं मानते उस फेथ को। जो फेथ ऐसा हो
26:33
जिसके पीछे कोई लॉजिक ना हो। एविडेंस ना हो। हम नहीं मानते। हम तो उस फेथ के कायल हैं जिसके पीछे लॉजिक हो और एविडेंस हो।
26:40
तो बिलीफ सही भी होता है, गलत भी होता है, फेथ भी सही होता है और गलत भी होता है। तो आज फेथ और बिलीफ के डिफरेंस पे बात नहीं
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हो रही है। आज आप चाहे फेथ एक्सेप्ट कर लें या बिलीफ एक्सेप्ट कर लें। आज ये बात होगी कि ट्रुथ क्या है? चाहे ट्रू बिलीफ
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सही है या ट्रू फेथ सही है और फॉल्स फेथ क्या है और फॉल्स बिलीफ क्या है? बात इस पे हो रही है। दूसरी चीज इन्होंने पूछा
27:00
स्टुपिडिटी फिर क्या है? अगर फेथ रिलीजन स्टुपिडिटी नहीं है तो और क्या है? क्योंकि फेथ का मुतालबा करते हैं तो
27:06
स्टुपिडिटी स्टुपिडिटी क्या है? मैं कहता हूं स्टुपिडिटी एथिज्म है। उसकी वजह ये है कि आप एक सड़क पे जा रहे हो और आप किसी
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गार्डन में जाएं और देखें वहां लिखा है फूलों के साथ आई लव जावेद अख्तर एंड आई
27:18
रियली डू आई लव यू सर। सो जब आप
27:24
वहां पर पहुंचे तो वहां पहुंचकर अब ये बताएं क्या आप ये कहेंगे वाओ व्हाट अ
27:30
नेचुरल सेक्शन। ये क्या नेचुरल सेक्शन है? नहीं। यह प्रिसाइजली डिज़ है। इसके पीछे
27:37
डिजाइनर है। लिहाजा अगर कोई एक ऐसी कॉमन सेंस की बात को कबूल नहीं कर रहा है कि
27:43
यूनिवर्स जो इतनी प्रिसाइज़ली काम कर रहा है। हम कह दें कि खुद ब खुद बन गई। मैं समझता हूं इससे बड़ी स्टबिडिटी और कुछ नहीं
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है। ये इररेशनल चीज है। फिर हमारे सर ने कहा कि आपने बॉल पे फोकस
27:57
किया, आइलैंड पे फोकस नहीं किया। अरे आइलैंड को किसने बनाया यही समझाने के लिए तो बॉल की मिसाल दे रहा हूं।
28:06
और बॉल भी कॉन्टिंजेंट है, आइलैंड भी कंटिंजेंट है। दोनों नेसेसरी बीइंग का मुतालबा करते हैं। आगे इन्होंने कहा कि
28:14
नेचर में कोई इंसाफ नहीं है। हम डिसाइड करते हैं कि मोरालिटी क्या होती है? इंसाफ क्या होता है? हम डिसाइड करते हैं जैसे
28:21
ड्राइविंग सीट में, ट्रैफिक वाला ये तो किसी खुदा ने नहीं कहा। ये है इसे कहते हैं फॉल्स इक्विवेलेंस। ये एक लॉजिकल
28:27
फैलेसी है। आपने जो है मिसाल दी ड्राइविंग की और ट्रैफिक की। ये सब्जेक्टिव मोरालिटी
28:32
है। आप सब्जेक्टिव मोरालिटी को मिसाल बनाकर ऑब्जेक्टिव मोरालिटी के ऊपर नहीं थोक सकते। इंसाफ ये ऑब्जेक्टिव मोरालिटी
28:38
है। अगर आप ये कहते हैं कि नेचर में इंसाफ नहीं है तो इंसाफ का ना होना ये नेचुरल
28:43
हुआ तो फिर नेचर को नेचर रहने दे। क्यों हम इतना स्ट्राइव कर रहे हैं दुनिया में इंसाफ लाने के लिए? ये तो इलॉजिकल बात है।
28:49
इरशनल बात है। इसलिए बहुत सी चीजें ऐसी हैं जो ऑब्जेक्टिवली जो है इविल या गुड
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हैं और बहुत सी चीजें ऐसी हैं जो सब्जेक्टिवली हैं। सब्जेक्टिवली जो मोरल होता है या इमोरल होता है उसको हम सोशल
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कंसेंस कंसेंसेस से या पर्सनल प्रेफरेंस से डिसाइड करते हैं। लेकिन जो ऑब्जेक्टिव मोरालिटी है जिसमें इंसाफ आया जो इन्होंने
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बार-बार रिपीट किया ये ऑब्जेक्टिव है। सब्जेक्टिव नहीं है। अगर आप कहते हैं ये सब्जेक्टिव है। तो मेरा सवाल आपसे यह है
29:16
क्या सोशल कंसेंसेस के जरिए अगर जुल्म को सही करार दे दिया जाएगा तो आप जुल्म को जस्टिफाई करेंगे? दूसरी चीज इन्होंने ये
29:25
कहा कि दो पैक शराब पी लें तो वो उतने पे नहीं रहता बढ़ जाता है। यही मामला मजहब के
29:33
साथ है। दो पैक आप पी लें बढ़ेगा। तो ये एक ऐसी मिसाल है इसको कहीं भी फिट कर लें कि आप एथिज्म पे जब फिट करें। जब आप दो
29:40
पैक एथिज्म का लेंगे ना तो वो बढ़-बढ़ के नॉर्थ कोरिया बनेगा। थैंक यू।
29:52
फर्स्ट राउंड की रिबटल के लिए मैं जावेद साहब को इनवाइट कर रहा हूं। आपके पास 7 मिनट का वक्त है। डिसेट कर दीजिएगा प्लीज।
30:00
मुझे इस बात की खुशी है कि मुफ्ती साहब ने भी मान लिया कि नेचर में कोई इंसाफ नहीं है। तो कोई भी चीज जो इंसान ने नहीं बनाई
30:09
है उसमें इंसाफ नहीं होता है। एक बात मैं आपसे अ करूं जरा पता लगा लीजिएगा। ये जो आप बाग में जाते हैं बेहद खूबसूरत फूल
30:15
देखते हैं ना इनमें से कोई नेचुरल नहीं है। ये सारे फूल क्रॉस करके बनाए गए हैं।
30:22
जो जंगल में फूल होते हैं निहायत मामूली होते हैं। ये फूल इंसानों ने बनाए हैं। जो आप बाग में देख के वाहवाह कहते हैं। ये
30:29
इंसानों के बनाए हुए हैं। डिफरेंट फूलों को क्रॉस करके डेवलप करके फिर क्रॉस करके इस तरह से बनाए गए हैं। नेचुरल फ्लावर्स
30:35
नहीं। किसी जंगल वीरान में जाके आप गुलाब के फूल नहीं देखेंगे। ये सब बनाए हुए हैं इंसान ने। बहुत से काम इंसान ने किए हैं।
30:43
बाकी ये कि आपने मेरी एक बात का जवाब नहीं दिया। जिससे मुझे शिकायत है कि फेथ क्या
30:50
है? और आप फेथ मांगते क्यों हैं मुझसे? आप तो लॉजिकल हैं। आपके पास तो सारे रैशन
30:57
हैं। आपके पास सारे सबूत हैं। तो आपको फेथ की डिमांड क्यों करते हो आप? कि भाई तुम
31:03
सरेंडर कर दो और सवाल मत करो। कोई मजहब सारे सवाल करने की इजाजत नहीं देता और मना
31:10
करता है कि ज्यादा सवाल ना करो बह जाओगे तुम। आप क्यों रोकते हैं? हकीकत ये है कि
31:17
इंसानी तारीख क्या है? इंसानी तारीख यह है कि दुनिया में दो तरह के लोग हुए हैं। एक
31:23
वो जिन्होंने अपनी लालमी की परस्तिश की है। दूसरे वो जिन्होंने अपनी इग्नोरेंस या
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लालमी से झगड़ा किया है और मालूम किया है कि क्या है। ये जो आप कह रहे हैं आज आप
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हैरान हैं कि भाई ये यूनिवर्स कैसे बनी? लोग हैरान थे कि सूरज डूबता है तो इधर से
31:41
कैसे निकलता है और आप एक कदम जाके हमेशा का मानने को
31:48
तैयार है। एक कदम पीछे ही मत जाइए। भाई आप इसके पास जाते हैं और कहते हैं सवाल ना करना कि ये कहां से आया? ये पावर तो हमेशा
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से हमेशा रहेगी। तो आप यूनिवर्स के बारे में मानेंगे क्या तकलीफ है? एक कदम पहले रुक जाइए।
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यह हमेशा से थी या नहीं थी हमें मालूम नहीं है। और यह कहना कि हमें मालूम नहीं
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है। कमाल यह है कि दुनिया के सारे मजहब सब जानते हैं। ये दुनिया कैसे बनी थी? कैसे
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मिटेगी? मरने के बाद क्या होगा? इनको सब इल्म है। इनको किसी को डायनासोर होते थे।
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पहले ये नहीं पता था। किसी को नहीं पता।
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किसी भी दुनिया की मजहबी किताब में डायनासोर का जिक्र नहीं है।
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लेकिन बाकी सब बातें हाउ टू मेक यूनिवर्स इन फॉर ईजी लेस एंड बाकी सब पता है। जिसको
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सब पता है वो गड़बड़ है। हम में ये इंकसार ये ह्यूमिलिटी होनी चाहिए कि हम ये कहें
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कि हमें ये बहुत सारी बातें नहीं मालूम। लेकिन हम उनकी परस्त ना कर। अपनी लालमी को
32:51
की परस्त ना करें। हम उसे पता लगाने की कोशिश करें। जिस दुनिया में आप बैठे हैं
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सर ये हॉल जो है ये इलेक्ट्रिसिटी जो है ये माइक जो है जिस हवाई जहाज से आप आए थे
33:03
वो जिस कार से आप यहां आए हैं ये सब उन लोगों की बनाई हुई है जिन्होंने सवाल किए
33:08
थे ये दुनिया जिसमें आप आज आराम से हैं ये उन
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लोगों की बनाई है कि जिन्होंने सवाल किए थे और हर स्टेज पे इन सवालों को
33:26
मकरूह कहा गया था, गलत कहा गया था। आप जरा तारीख पढ़िए। बड़ी दिलचस्प किताब है बटन की
33:34
जिसमें उसने रिलजन एंड साइंस के कब से रिलीजन जो है साइंस के अगेंस्ट है और हद
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तो ये है कि भाप के इंजन के खिलाफ थे। स्टीम इंजन के भी खिलाफ थे। और फतवे उन पे
33:50
वेटिकन ने दिए। तो ये हमेशा अभी जैसे ही ये राइट फिंगर
33:56
आते हैं अमेरिका में पावर में तो वो जो अपना ये
34:02
क्या बोलते हैं उसे सीड क्या बेटे सीड क्या जो
34:09
नहीं नहीं सीड जो होते हैं जी
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नहीं भाई वो जो ह्यूमन बॉडी के
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उसप रिसर्च बंद हो जाती है। रिपब्लिकन नहीं करने देते।
34:33
अरे भाई इतना डर क्या है तुम्हें? एक जमाने में बहुत नाराज थे ये सारे मजहबी
34:39
लोग कि ये इंसान तो इंसान बनाने की कोशिश कर रहा है। आपको क्या तकलीफ हुई? बना ले तो बना लेने दो। ये खौफ क्या है?
34:48
और यह सब आज जो आप कह रहे हैं नामुमकिन है यह कैसे हुआ मुझे एक किस्सा याद आता है जब
34:55
मैं छठी क्लास में था तो मैं मैथमेटिक्स में बहुत वीक था तो एक टीचर रख दिया गया उसने एक दो तीन चार पांच छ सात तो सिखा
35:02
दिया मुझे वो दिन मैं भूल नहीं सकता हूं उसके साथ जिस दिन उसने ये बताया कि 1/2
35:07
क्या होता है और 3/4 क्या होता है मुझे ऐसा लगा कि मेरा सर बीच से फट जाएगा ये
35:13
आदमी कह रहा है कि यूं दीवार के अंदर जाओ वॉक करते हुए आज हंसता हूं मैं इस बात पे।
35:19
तो आज जो बातें आपके ज़हन से बिल्कुल परे हैं और आप हैरान होते हो उन्हें देख के।
35:24
एक वक्त आएगा कि मामूली लगेंगे और हुआ है आपकी इंसानी तारीख है। इतनी जल्दी सारे
35:30
फैसले आप मत कर लीजिए। थोड़ा ह्यूमिलिटी रखिए कि भाई ये हमें नहीं मालूम। ये कहने
35:37
में क्या है? ये यूनिवर्स कहां तक फैली? ये कब से है और कब तक रहेगी? हमें नहीं
35:43
मालूम। आपने फैसला कर लिया कब बनी? ये आपके हिसाब से कोई 14 बिलियन इयर्स बनी जो
35:50
समझा जाता है। उससे पहले हजारों करोड़ों अरबों साल तक खुदा बैठा क्या कर रहा था?
35:58
खामोश बैठा था ऐसे ही जमाइयां ले रहा था। फिर उसे आईडिया आया यार एक काम करते हैं।
36:03
वक्त अच्छा गुजर जाएगा यूनिवर्स पर। सोचिए
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वो तो हमेशा से है ना मगर यूनिवर्स हमेशा से नहीं है। ये तो बनाई गई है और उससे
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पहले क्या था? इनका क्या काम था? कैसी बात है? ये बड़ा आसान है। जो बात
36:24
हमें आज धीरे-धीरे पता चली है। बरसों 2000 और ढाई हजार साल पहले आपको किसी ने बता
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दिया कि क्या था आप मान गए? और तब से वही मान रहे हैं जो ढाई हजार साल पहले कहा गया
36:35
था। सब कुछ बदल गया है। सॉल्व हो रही है चीजें। अभी
36:41
साइंस बिलकुल दावा नहीं करती या कोई फिलॉसफर ये दावा नहीं करता कि हमें सब
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मालूम है। बल्कि वो कहता है कि हमें जितना मालूम होता है उससे ये मालूम होता है कि हमें कितना कम मालूम है। तो हम अपनी
36:54
जिहालत से लड़े उसकी परफेक्ट ना करें। जी थैंक यू। थैंक यू सो मच।
37:03
मैं तर्कों की श्रंखला में राउंड टू के लिए मुफ्ती साहब को आमंत्रित कर रहा हूं। आपके
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पास एक बार फिर से 7 मिनट का वक्त है।
37:16
शुक्रिया। जनाब जावेद अख्तर साहब कई मर्तबा दोहरा रहे हैं कि फेथ का मतलब
37:22
बताइए। फेथ का मतलब बताइए। मैंने बता दिया। फेथ सही भी होता है, गलत भी होता है। और आज हम फेथ पे बात नहीं कर रहे। हम
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ट्रुथ और डस गॉड एक्सिस्ट पे बात कर रहे हैं। क्या डस गॉड एक्सिस्ट? यह ट्रुथ यानी
37:34
गॉड है या नहीं है? इसमें से दोनों ट्रुथ क्या है? अब आप उसे फेथ कह ले, बिलीफ कह लें, नॉट माय बिजनेस। उसके बाद आपने कहा
37:41
कि भाई सवाल करने से मजहब रोकता है। मैं कहता हूं जो रोकता है वो रोकता होगा। मैं
37:48
नहीं रोकता। बल्कि सवाल करें। सवाल करना चाहिए। सवाल कर के तो हम आगे बढ़ते हैं,
37:54
तरक्की करते हैं। और इसीलिए मैं आज यहां पे आया हूं। लेकिन सवाल सिर्फ खुदा से नहीं होगा। आपसे भी होगा। सवाल एथिज्म से
38:00
भी होगा। सवाल सिर्फ मजहब से नहीं होगा। सबसे होगा। और आज मैं सवाल करूंगा और उम्मीद है कि आप जवाब देंगे। अभी तक आपने
38:06
वैसे कंटिंजेंसी आर्गुमेंट का कोई जवाब नहीं दिया है। चलें। आपने कहा यूनिवर्स के बारे में इटरनल क्यों नहीं बोल देते? ये
38:14
क्योंकि लॉजिकली पॉसिबल ही नहीं है कि यूनिवर्स इटरनल हो। यूनिवर्स एक कंटिंजेंट
38:19
चीज है। जो टाइम एंड स्पेस के पाबंद है। टाइम एंड स्पेस से बाउंड है। जो टाइम एंड
38:24
स्पेस से बाउंड होगा वो कंटिंजेंट होगा। जो कंटिंजेंट होगा वो उसकी बिगिनिंग हुई होगी। जिसकी बिगिनिंग हुई होगी वो इटरनल
38:31
नहीं हो सकता। ये तो कॉमन सी बात है।
38:36
आपने कहा कि किसी मजहबी किताब में डायनासोर का जिक्र नहीं है। अफसोस कि आज तक किसी मैथमेटिक्स के किताब में मुझे
38:43
डायनासोर का जिक्र नहीं मिला। तो इसका मतलब मैथमेटिक्स की किताब बेकार
38:50
है। नहीं उसका वो टॉपिक नहीं है। रेवेलेशन का और मजहबी किताबों का टॉपिक ये नहीं है कि आपको आकर बताएं साइकिल कैसे बनाते हैं।
38:56
ये आकर ये बताएं कि जो है डायनासोर कब था। वो तो मोरालिटी सिखाने आया है। गॉड के बारे में बताने आया। नॉन फिजिकल रियलिटी
39:03
की हकीकत को सिखाने के लिए आया। रिलीजियन साइंस को रोकता है। नहीं रोकता। अगर रोकता है तो गलत करता है। रिलीजन साइंटिज्म को
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रोकता है जिसमें हमारे जावेद साहब मुख्तल है। साइंस
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साइंस और साइंटिज्म में फर्क है। साइंटिज्म ये है कि आप समझे के साइंस और
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साइंटिफिक मेथोडोलॉजी ये नॉलेज को हासिल करने का वाहिद सोर्स ऑफ नॉलेज है। ये है
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साइंटिज्म। हम इसे रिजेक्ट करते हैं। हम साइंस को तो तरक्की करते हैं। भाई आप हमारी पूरी तारीख कर लें। पढ़ लें तो आपको
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पता चल जाएगा। बहरहाल यह अलग टॉपिक है। उसके बाद इन्होंने एक लफ्ज़ कहा वेटिकन ने फतवा दिया। वेटिकन का फतवे से कोई ताल्लुक
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नहीं है। दोनों कंट्राडिक्टरी अल्फ़ाज़ हैं। उसके बाद उन्होंने कहा कि भई हमें नहीं मालूम। अगर नहीं मालूम तो क्लियरली
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कह दे ना कि नहीं मालूम है। इसमें क्या हरज है? तो वही तो मैं कह रहा हूं ना कि आप कह दे कि नहीं मालूम लेकिन क्लेम क्यों
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कर रहे हैं कि गॉड एक्सिस्ट नहीं कर रहा है।
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आप कह दे नहीं मालूम है। हो सकता है हो सकता ना हो। लेकिन आप क्लेम कर रहे थे। द मोमेंट यू से गॉड डज नॉट एक्सिस्ट। दिस इज
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अ क्लेम एंड नाउ द बर्डन ऑफ प्रूफ इज अपॉन यू टू। जैसे हमारे ऊपर है।
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और क्यों है मैं बताता हूं। क्यों है ये भी मैं बताता हूं। फिलॉसोफिकली
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जो क्लेम होता है ना सिर्फ यह नहीं होता कि इंसान कहे पॉजिटिव क्लेम करे और
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नेगेटिव क्लेम करे तो बर्डन अप्रूव नहीं है। आप मिसाल के तौर पे मैं कहूं कि फुला उस कमरे में कोई नहीं है। मैंने एक नॉलेज
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का क्लेम किया है। उस कमरे में कोई नहीं है। मैंने एक नॉलेज का क्लेम किया। या तो मैं कहूं मुझे नहीं पता हो भी सकता है,
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नहीं भी हो सकता है। दिस इज़ नॉट अ क्लेम। लेकिन जब मैं कह रहा हूं कि वहां कोई नहीं है या मैं कह रहा हूं वहां कोई है। दोनों
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क्लेम है और दोनों के ऊपर बर्डन ऑफ प्रूफ है। हमारे ऊपर भी बर्डन ऑफ प्रूफ है। मैंने कंटिंजेंसी आर्गुमेंट दिया। इसे
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तोड़ कर दिखाइए। आखिरी चीज इन्होंने कहा के खुदा दुनिया
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बनाने से पहले 150 साल पहले या करोड़ों साल पहले क्या कर रहा था? अरे हजरत
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चल बहरहाल मैं जवाब दे देता हूं। अब आप हमारे रिस्पेक्टेड पर्सनालिटी हैं। अगर आप नहीं होते तो मैं ऐसे एंटरटेन ही नहीं
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करता। टाइम ये 100 साल पहले या 100 साल बाद पहले
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बाद में अभी ये वो अल्फाज़ है जिनका ताल्लुक टाइम से है। टाइम शुरू ही हुआ है
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यूनिवर्स की बिगिनिंग के बाद। तो उसके पहले खुदा क्या कर रहा था? सवाल इलॉजिकल है। ये फैलेसी है। यानी आप ये कह रहे हैं
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कि यूनिवर्स के बनने से पहले खुदा क्या कर रहा था? टाइम के बनने से पहले, पहले का ताल्लुक टाइम से है, टाइम उस वक्त था ही
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नहीं। तो ये सवाल ही इनवैलिड है खुदा के ताल्लुक से।
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दूसरी चीज़, आर्गुमेंट ऑफ कंटिंजेंसी जो मैंने आपके सामने पेश की है। आपने बार-बार
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ये प्रूफ किया और ये कह रहे हैं कि गॉड ऑफ गैप्स। देखिए पहले नहीं मालूम था साइंस ने कर दिया। सिंपल की मिसाल से मैं समझा देता
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हूं। जिस गैप्स की आप बात कर रहे हैं ना साइंस उन गैप्स को जिन चीज के जरिए भी
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प्रूव करेगा वो कंटिंजेंट ही होगा। अब चाहे वो फोर्स हो, मैटर हो या एनर्जी हो।
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लिहाजा सवाल हमारा उस वक्त भी वैलिड होगा जब तक कि आप नेसेसरी बीइंग पे ना आ जाएं।
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और इनफिनिट रिग्रेस पॉसिबल नहीं है ऑफ कॉजेस इन प्रैक्टिकल वर्ल्ड। तो जाहिर है
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कहीं रुकना पड़ेगा। जहां रुकेंगे वहीं खुदा है। दूसरी चीज आपने
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ये कहा क्या कह रहा था मैं? किस पॉइंट को?
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आफ्टर दैट जस्ट जस्ट जस्ट नाउ। हां जहां रुकेंगे वही खुदा है। बहरहाल तो
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टाइम का जिक्र हो गया। गॉड ऑफ़ गैप सॉरी या इसकी एक मिसाल आप ले लें। एक कार है। एक
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साहब ने देखा कि भाई कार जो है उसके व्हील्स कितने अच्छे लगे हुए हैं। सही जगह
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पे। स्टीयरिंग जो है कितने अच्छे जगह पे लगी हुई है। और सीट्स कितने वेल डिज़ है।
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कितनी प्रिसाइजली ये कार काम कर रही है। तो जरूर कोई ना कोई इसे क्रिएट किया है।
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किसी ने क्रिएट किया है। अब जावेद साहब आए और कहे अरे जनाब बोननेट खोलिए। इसमें इंजन है। इंजन इस कार को चला रहा है। हेंस
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प्रूव्ड नो वन हैज़ क्रिएटेड द कार। दिस इज़ इलॉजिकल। दिस इज़ इरशनल। आपने इंजन के जरिए
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उस गैप को तो साबित किया लेकिन क्या उससे
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कि कार की जो क्रिएशन है और उसका जो क्रिएटर है ये इंपॉसिबल हो जाए ऐसा पॉसिबल
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है उसका सवाल खत्म हो जाए ऐसा पॉसिबल है नहीं आपने गैप्स को फिल करके कंटिंजेंट
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चीजों से गैप्स को फिल करके हमारे ऑब्जरवेशन को और ब्रॉड कर दिया अब हमें और पता चल गया कि ये जो कार है इसका सिस्टम
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कितना ज्यादा कॉम्प्लेक्स है। पहले कम समझते थे। अब कॉम्प्लेक्सिटी और ज्यादा वाज़ हो गई। अब हमें समझ में आ रहा है कि
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हमारी सर्टेनिटी और बढ़ गई कि जरूर इस कार को किसी ना किसी ने बनाया। यही मामला यूनिवर्स का है। साइंस हमेशा फिजिकल
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वर्ल्ड की चीजों को ही फिल करती जाएगी और फिजिकल चीजों से ही करती जाएगी। चूंकि इंपेरिकल एविडेंस का ताल्लुक फिजिकल
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वर्ल्ड से है। आप साइंस के जरिए मेटाफिजिकल रियलिटी को कभी साबित नहीं कर सकते। तो ये रॉन्ग टूल का इस्तेमाल करना
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है। यह वही काम है कि आप मेटल डिटक्टर से प्लास्टिक डिटक्टर करने चलें जो कि जाहिर
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है सही नहीं है। थैंक यू।
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जी। ये आर्गुमेंट का राउंड टू है। सात मिनट।
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पहले तो मैं आपसे अर्ज करूं कि आपने कहा कि जब कायनात ही नहीं थी तो वक्त भी नहीं था, कुछ भी नहीं था। कैसे नहीं था? खुदा
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था? एक एक्सिस्टेंस तो था ना खुदा का तो जब खुदा था तो व भी होगा। ऐसा नहीं है कि कुछ
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भी नहीं था। खुदा था। अच्छा बाकी है कि आपने कहा साहब आप साबित कीजिए। आपके पास भी लॉजिक है या मेरे पास भी लॉजिक है। आप
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मेरा जिम्मेदारी नहीं है साबित करना कि खुदा है। बर्टन रसेल ने बड़ी अच्छी बात
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कही। बर्टन रसेल ने एक बड़ी अच्छी बात कही है। मैं आपसे अगर यह दावा करूं कि एक चाय की
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केतली मिरर के चारों तरफ घूम रही है। मार्स के चारों तरफ तो यह आपका काम नहीं है कि आप साबित करें कि कोई चाय की केतली
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नहीं है। यह मेरा काम है। मैंने दावा किया है। यह दावा तो मजहबी लोग करते हैं कि खुदा है। मैं क्यों साबित करूं कि नहीं
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है? जब तक आप मुझे कन्फस नहीं कर देंगे मैं नहीं मानूंगा। आपकी जिम्मेदारी है। मेरी जिम्मेदारी नहीं
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है। दो यह कि यह जो आप कह रहे हैं जो गैप्स
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हैं ये गैप जब किसी मजहब को चैलेंज करते हैं। जब ऐसा कोई बात आती है तो हंगामा हो
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जाता है। के जब वो चैलेंज करें किसी फेथ को ये तमाम साइन जो है इसे मुख्तलिफ जगहों
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पे मुख्तलिफ वक्तों में मजहब ने रोकने की कोशिश की है। ये किताब है रिलजन एंड साइंस
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बट नसल की पढ़िएगा अच्छी लगेगी आपको। तारीख ही है साइंस मजहब की साइंस से उसका
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यही रिश्ता है। अच्छा अब ये हम सोचे कि बहाल ये वजूद जो है मजहब और ये बिलीफ इन
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गॉड इंसान को बेहतर बना देता है। तो एक काम कीजिए हिंदुस्तान वर्ल्ड का नक्शा लीजिए और मार्क कीजिए कि रिलजन कहां-कहां
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ज्यादा है। कहां-कहां चाहे वो लैटिन अमेरिका हो या मिडिल ईस्ट हो या फार ईस्ट
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हो या हिंदुस्तान के वो इलाके जहां मजहबीियत ज्यादा है। रख दीजिए नक्शा अलग।
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अब दूसरा नक्शा के कहां-कहां नाइंसाफी, रिप्रेशन, औरतों के हुकूक की पामाली,
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जुल्म, डिक्टेटरशिप कहां है? नक्शा एक ही होगा।
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तो आप मुझे बताएं के जो, इसका तरकीब इस्तेमाल क्या है?
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खुदा का तरकीब इस्तेमाल तो बताइए। आप छोटी सी दवा सड़क पे बेचते हैं। उसकी भी तरकीब इस्तेमाल बताते हैं। इसके इस्तेमाल से तो
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फायदा ही नहीं हुआ किसी को। जो सारे के सारे खराब मुल्क हैं, खराब समाज है वो
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सारे जुल्म खुदा के नाम पे करते हैं। वो गलत करते हैं, सही करते हैं। मुझे क्या
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लेना देना उससे? इस्तेमाल से मालूम होता ना। एक विस््की की बोतल कभी शायद देखी हो
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आपने। लाल रंग की होती है उसपे रोशनी और छिपड़ इंतहाई खूबसूरत लगती है। क्या बिगाड़ रही है किसी का? उसका इस्तेमाल गलत है।
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इसलिए आप उसे नापसंद करते हैं। इसका इस्तेमाल गलत है। इस तसवुर का
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इस्तेमाल ही गलत है और हमेशा से गलत हुआ है। आप देख लीजिए इंसानी तारीख देख लीजिए। आज देख लीजिए हिंदुस्तान देख लीजिए।
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दुनिया देख लीजिए। क्या हो रहा है? इसे कैसे इस्तेमाल कर रहे हैं? फेथ वाले
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लोग क्या फेयर हैं? जस्ट हैं जो अपने खुदाओं पे यकीन रखते हैं। वो किस तरह के
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लोग हैं? वो लोगों को इंसाफ देते हैं। वो बेहतर इंसान बने। तो इस दवा का फायदा क्या है?
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चलो बहुत फायदा हो रहा तो मैं इस्तेमाल कर लूंगा। म मुझे तो इस दवा का कोई फायदा दिखता ही नहीं। मुझे तो ऐसा लगता मैं एक
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और बात बताऊं। अगर कोई आदमी मजहबी है और अच्छा आदमी है तो मैं उसकी बहुत इज्जत
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करता हूं। इसलिए कि मेरा ख्याल है मजहबी आदमी का अच्छा होना मुझसे अच्छा होने से
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ज्यादा मुश्किल है। भाई हर चीज की एक लिमिट है। आप इतना भाग सकते हैं, इतना
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नहीं भाग सकते। इतना वजन उठा सकते, इतना नहीं उठा सकते। इतना दूर देख सकते हैं, इतना दूर नहीं देख सकते। उसी तरह कॉमन
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सेंस कहता है कि आप में नेकी का भी एक कोटा होगा। अब आप अगर सुबह जाते हैं अपनी
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इबादतगाह और इबादत करते हैं तो बाहर निकलते हैं तो आप तो यही महसूस करते हैं कि आपने एक बहुत अच्छा काम किया। आपकी
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नेकी का एक बहुत बड़ा कोटा खर्च हो गया जिससे किसी का कोई फायदा नहीं होगा। मैं तो नहीं जाता हूं तो मुझे तो किसी को खाना
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खिलाना पड़ेगा। किसी बेवा की मदद करनी पड़ेगी। मैं अपना कोटा कैसे कंज्यूम करूं?
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आप अपना कोटा सारे मजहबी लोग इंतहाई यूज़लेस कामों में यूज़ करते हैं। उसके बाद
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भी अगर आप में बचती है थोड़ी सी शराफत तो भाई वाह क्या बात है।
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एक तो मुझे यह बात बहुत अच्छी लग रही है कि दोनों ही विद्वान समय को मानते हैं और
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बहुत समय से अपनी दलीलें और बाज दफा समय से पहले अपनी तकरीरें पूरी करके अपनीपनी
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कुर्सी पर बैठ रहे हैं। ये इस आर्गुमेंट का राउंड टू पूरा हुआ। अब रिबर्टल का
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राउंड टू है और उसके बाद क्रॉस एग्जामिनेशन होगा। नहीं आपका आर्गुमेंट हो गया सर।
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हमारे यहां स्कूल के सिलेबस में पंच परमेश्वर कहानी पढ़ाई जाती है प्रेमचंद जी की लिखी हुई। आप निश्चिंत रहिए। आपके कोई
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राउंड मैं मिस नहीं होने दूंगा। रिबटल का राउंड टू मुफ्ती शमाल नदवी साहब।
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असल में जो हकीकी प्रॉब्लम है असल प्रॉब्लम है वो यह है कि जावेद साहब के पास कासेप्ट ऑफ गॉड क्लियर नहीं है।
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इन्होंने कहा कि कायनात से पहले खुदा तो था तब भी तो टाइम होगा कि खुद कायनात टाइम
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कायनात का हिस्सा है। हम खुदा उस खुदा को मानते हैं। नेसेसरी बीइंग का टाइमलेस होना
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जरूरी है। क्योंकि वो टाइम का क्रिएटर है। जब उसने टाइम को क्रिएट किया तो वो खुद टाइम पे कैसे होगा? उसने जब स्पेस को
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क्रिएट किया तो खुद स्पेस में कैसे होगा? अगर वो टाइम एंड स्पेस को पहले से ही उसका पाबंद है तो फिर किस चीज को उसने क्रिएट
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किया? लिहाजा ये सवाल गलत है के खुदा था तो टाइम होगा। बिल्कुल नहीं। टाइम के
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पाबंद हम है खुदा नहीं है। हम फिजिकल वर्ल्ड से ताल्लुक रखते हैं। वो मेटाफिजिकल रियलिटी है। दूसरी चीज
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इन्होंने मिसाल दी कि चाय की खेतली हवा में घूम रही होगी और पता नहीं शायद वो बर्टन रसेल का उन्होंने हवाला दिया।
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बहरहाल यही प्रॉब्लम है। प्रॉब्लम यही है कि हम चीजों के दरमियान डिफरेंशिएट नहीं
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कर पाते हैं। ये जो आपने मिसाल दी ये इमेजिनेशन है। और मैं जो साबित कर रहा हूं वो लॉजिकल नेसेसिटी है।
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आप इमेजिन करने आए तो कुछ भी करें। जुपिटर में पिंक एलीफेंट होगा, यूनिकॉर्न होगा करें। उसके उससे कायनात पे क्या फर्क
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पड़ता है? उससे आप लॉजिकल नेसेसिटी साबित नहीं कर सकते। मैं तो उस प्राइम कॉज की
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बात कर रहा हूं। उस नेसेसरी बीइंग की बात कर रहा हूं जिसके बगैर इस कायनात का एग्ज़िस्टेंस मुमकिन नहीं है। दूसरी चीज़
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मज़हब को साइंस चैलेंज करती है वगैरह वगैरह ये हमारा टॉपिक ही नहीं है। मैं मैं इस पे बात करूंगा तो फिर मेरा वक्त चला जाएगा।
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मज़हब के ऊपर क्योंकि हमारी डिस्कशन नहीं है। साइंस को मज़हब और बिलखसूस मैं और
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हमारा वर्ल्ड व्यू कम से कम साइंस को पीछा नहीं पीछे नहीं करता है। साइंटिज्म की मज़म्मत करता है। इसकी वजाहत मैंने पहले कर
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दी। दूसरी चीज़ चीज इन्होंने कहा वर्ल्ड का नक्शा लीजिए। वर्ल्ड मैप लीजिए दो अलग-अलग
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जगह की। हजरत मैंने यह होमवर्क किया था और मैंने मिडिल ईस्ट मिडिल ईस्ट का एक नक्शा
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लिया और यूरोप का एक नक्शा लिया। ये मजहबी इलाका और ये
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लिबरल और एथस्ट इलाका। मुझे पता चला कि सबसे ज्यादा रेप केसेस जो है वहां पर है।
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मुझे ये पता चला यूएन की रिपोर्ट के मुताबिक। मैं ये अपने घर से नहीं लेके आ रहा कि जो वर्किंग वुमेन है यूरोपियन
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कंट्रीज में उसमें 81% वुमेन सेक्सुअल हरासमेंट का वर्क में शुमार ये मिडिल ईस्ट में नहीं हो रहा है।
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वो मजहबी लोग हैं इसलिए नहीं हो रहा है। दूसरी चीज आपने ये कहा के मजहबी आदमी का
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अच्छा होना हमारे अच्छे होने से बहुत मुश्किल है। बहुत मुश्किल है। तो इसका
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मतलब ये है कि गॉड के अलावा आपके पास अच्छे और बुरे का कोई स्टैंडर्ड है। मैं
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चाहूंगा कि कन्वर्सेशनल स्टाइल वाले डिस्कशन और सेगमेंट पे इसी पे बात कर लेते हैं। थैंक यू वेरी मच।
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ये रिबटल का राउंड टू है। आपके पास 5 मिनट का वक्त है और इसके बाद क्रॉस एग्जामिनेशन
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शुरू करेंगे। आप चाहे तो जो इन्होंने सवाल पूछे उनके जवाब आप रिबर्टल में भी दे सकते हैं। जी जी
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देखिए पहले तो ये बात कि ये मिसाल गलत नहीं है। गलत है। इन्होंने पहले ही हमको
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डिस्म कर दिया। कह अकल से मामला सॉल्व नहीं हो सकता। लॉजिक से आप पहुंच नहीं सकते। यह एक मेटाफिजिकल चीज है।
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मेटाफिजिकल अजीब सा लब्ज़ है। ठीक से किसी को माने नहीं मालूम इसके तो ऐसा लगता है कुछ बड़ी चीज है। अरे भाई क्या होता है
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मेटाफिजिकल? बताओ खड़ी हो। ये एक लफज़ है जो
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कहीं भी इस्तेमाल हो जाता है। जब आप एक बात कर रहे हैं और आप मुझसे बहस कर रहे हैं तो मुझे मेटाफिजिकल मत बताइए। आप
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लॉजिकली मुझे प्रूफ किए और अगर लॉजिकली आप नहीं बात करते साहब ये मेटाफिजिकल है तो फिर हम आप बात क्या कर रहे हैं मेरा आपका
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किस जुबान में कन्वर्सेशन हुआ और ये कहना कि वक्त पहले नहीं था तो फिर
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क्यों कहते हैं ये हमेशा से और हमेशा रहेगा हमेशा वक्त है तो आप कैसे कहते हैं
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वो हमेशा से है और हमेशा रहेगा हमेशा का मतलब है कोई वक्त अगर वक्त ही नहीं है तो
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हमेशा कैसे बहरहाल वो रहेगा। अब मैं यह देखता हूं।
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आपने कहा ना कि वहां रेप ज्यादा होते हैं। तो हम एक बात देखते हैं कि ये दुनिया जिस
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वो कादरे मुतलक है। जिसकी मर्जी के बगैर पत्ता भी नहीं हिलता वो ओमनीपोटेंट है। ये
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दुनिया चल कैसे रही है? और इस दुनिया का हाल क्या है? 45,000
54:06
बच्चे जो 10 साल की उम्र से कम थे वो अदा में
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मरे हैं। भूख से काला हांडी में बच्चे मरते हैं और
54:19
डिप्थीरिया से मरते हैं। डिप्थीरिया अजीब मर्द है। गले में जाली मरना शुरू होती है।
54:25
बच्चा नीला हो जाता है। गरीब का बच्चा इसलिए कि वो पास ला ये कादरे मुक है। जो
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चाहे कर दे इससे आप दुआएं मांगते हैं हमारी ये काम कर दे वो कर दे तो इसका मतलब डे टू डे लाइफ में वो इंटरफेयर करता है और
54:39
ये देख रहा है वो अगर वो वाकई भी है फॉर डिस्कशन सेक तो मैं जब दुनिया देखता हूं
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तो मेरे दिल में उसके लिए कोई इज्जत नहीं पैदा होती क्या कर रहे हो तुम
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पूरे ऑल पावरफुल हो ओमनीपोटेंट हो ओमनी प्रेजेंट हो तुम तो वहां गधा में रहे होगे
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ना तुम हर जगह तुम देख रहे थे कि बच्चे की कैसे धज्जियां उड़ गई। तुम देख रहे थे और
55:07
तुम चाहते हो मैं तुम्हारी परस्त करूं और तुम हो भी। अरे यार इससे अच्छे तो हमारे चीफ प्राइम
55:13
मिनिस्टर हैं। कुछ तो ख्याल करते हैं। कमाल है। आप किसकी इबादत कर रहे हैं? अगर
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वो है भी। ये दुनिया नाइंसाफी से, जुल्म से, जब्र से, तशद्दुद से भरी हुई है। और
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आप यह मत कहिएगा कि वो देख रहा है और वो बताएगा एक दिन। अगर वो देख रहा है और
55:35
इंटरफेयर नहीं करता तो आप दुआ क्यों मांगते? आप कहते हैं मेरा यह काम करा दे। इसका मतलब है वो दखल दे सकता है। वो आपको
55:43
नौकरी दिलवा सकता है। भले दूसरे आदमी को ना मिले। मगर आपका काम कर देगा क्योंकि
55:48
आपने दुआ मांगी है। तो जब वो आपको नौकरी दिला सकता है, लड़की की शादी कर सकता है,
55:54
बेटे को ग्रीन कार्ड दिलवा सकता है तो कम से कम ये जो मर रहे हैं बच्चे इनको रोकते
56:00
कुछ तो करें। मुझे तो दुनिया में इस दुनिया का कोई मालिक है। इसका ओमनीपोटेंट
56:06
कोई रूलर है। और ये दुनिया ऐसी चल रही है। मैं तो चाहूंगा कि भाई ना हो। अगर हो तो
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बड़ी शर्मिंदगी की बात है। शुक्रिया।
56:22
देवियों और सज्जनों इस बहस के दो राउंड और दो रिबटल पूरे हो चुके हैं। अब सबसे जरूरी
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और सबसे मुश्किल राउंड शुरू हो रहा है क्रॉस एग्जामिनेशन का। अब इन विद्वानों की
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सज्जनता की एक परख भी होगी। और वक्त हमने 16 मिनट का तय किया है।
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पहला सवाल आप पूछना चाहेंगे? जी बिल्कुल पहले बोले भी
56:50
आप माइक ले लीजिएगा हाथ में। नीचे से हटवाने।
56:58
जी मैं मैं बोलता हूं। ये डाइस हटा सकते हैं क्या हम? थोड़ा
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क्विकली। डाइस पीछे कर दीजिए बस थोड़ा सा ताकि यह
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जो दाएं बाएं लोग बैठे हैं इसे हटा ही दीजिए। अब हम वहां तो जाने वाले नहीं आराम
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से आराम से दोनों तरफ से हटा दीजिए।
57:27
इस बीच आप लोग भी अपनेप सवाल तैयार कर लें। यह ध्यान रखेंगे कि मैं यहां से सवाल
57:33
लूंगा। आप लोगों को अपना हाथ ऊपर करना है। अपना नाम बताना है और अधिकतम तीन वाक्यों
57:39
में अपना सवाल पूरा करना है। कई लोग सवाल की जगह भाषण देने लगते हैं। उससे आज बचना
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है। जी मुफ्ती साहब पहला सवाल आपका 16 मिनट है। हम दोनों लोगों के सवाल लेंगे। जी
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बहुत शुक्रिया। आप आपकी जो अभी बात हुई बहुत अहम थी। मैं इसको चाहूंगा कि आगे डिस्कस करूं। लेकिन चूंकि अभी इस वो
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सेगमेंट है क्रॉस एग्जामिनेशन। तो सबसे पहला सवाल आपसे ये है कि जो मैं
58:06
इतनी देर से कंटिंजेंसी आर्गुमेंट आपको बता रहा था ये अक्कल से ही बता रहा था हजरत आप ये बताएं के आप इनफिनिट रिग्रेस
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ऑफ कॉज को पॉसिबल मानते हैं या नेसेसरी बीइंग के एक्सिस्टेंस को सही समझते हैं क्योंकि दो ही ऑप्शन हो सकता है। आप ये
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बताएं देखिए आपको मैं ईमानदारी से बात कर रहा हूं। एक तो मैं कॉन्टिजेंसी वर्ड ठीक से समझता हूं।
58:26
और इस वक्त भी जो आपने अंग्रेजी के अल्फाज़ इस्तेमाल किए वो जरा थोड़े से मुझे डिफिकल्ट और कॉम्प्लिकेटेड लगे। तो आप जरा
58:34
सिंपल ज़ान में ये सवाल कर सकते हैं। बिल्कुल कर सकता हूं। यूनिवर्स की हर चीज कॉन्टिंजेंट होने का
58:39
मतलब ये है कि वो अपने एकिस्टेंस में किसी के ऊपर डिपेंडेंट है। जो भी चीज डिपेंडेंट
58:44
होगी वो चीज इंडिपेंडेंट नहीं हो सकती। तो उसका कोई ना कोई कॉज होगा। तो अब आप क्या
58:50
समझते हैं कि ये इनफिनिट रिग्रेस है यानी कॉज पर कॉज कॉज पर कॉज कॉज पर कॉज और कभी
58:55
कोई एंड यानी एंडलेसली चलता रहा क्योंकि अगर ऐसा होगा तो हम तो एक्सिस्टेंस में आते ही नहीं। लॉजिकली ये मुत्तफाक अल चीज
59:02
है। मुत्तफाक अल अग्रीड अपॉन ओके इस पे हमने एग्री किया था कि मुश्किल शब्द
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आएगा तो अर्थ बताना पड़ेगा। तो इनफिनिट रिग्रेस तो पॉसिबल नहीं है। तो कहीं ना कहीं आपको रुकना पड़ेगा एस
59:14
नेसेसिटी पर। नहीं कोई जरूरत नहीं है रुकने की। किसने कहा आपको रुकना पड़ेगा? आप रुकते हैं खुदा पे आप नहीं रुकते आप कहते हैं वो हमेशा से
59:23
जब उस वक्त से है जब वक्त नहीं था आप कहां रुकते हैं कि अब हुआ था वो आप नहीं कहते
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हम क्यों नहीं मान सकते कि यूनिवर्स जो है और बल्कि मल्टीवर्स जो है वो हमेशा से हैं
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वो बनती है एक हमारे यहां एक चीज है ब्लैक
59:40
होल वो समेट लेता है वापस फिर ब्लास्ट होता है फिर फैल जाता है और इसमें हमारी
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तो खैर कोई औकात ही नहीं इंसान की एक छोटे से जर्रे पे हम 50 60 साल की उम्र रखते
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हैं जो करोरा अरबों साल की कायनात उसमें और पैदा भी निहायती बेहूदा वजह से हुए थे
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तो तो इसमें ये सोचना कि इसकी वजूहात और ये क्यों है ये डिपेंडेंट है ये हम देख
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रहे हैं क्या मालूम आप सोचिए कि ये जो फैल रही है कायनात ये कहां फैल रही है ये कहां
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जा रही है और ये फैल क्यों रही है अरे बना ली थी तुमने रुको भैया हमें काफी है ये फैल क्यों रही है और कौन सी कायनात जिसे
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मैं दूरबीन से देखता हूं तो दो बिलियन लाइट ईयर पे है उससे मेरा कोई वास्ता ही
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नहीं है दो बिलियन ईयर यानी अगर मैं 80
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थाउजेंड माइल्स पर सेकंड से चलूं तो 20 करोड़ साल में वहां पहुंच जाऊंगा इसकी
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जरूरत क्या थी ये दुनिया ये कायनात तो इंसान अशरफुल मखलूकात के लिए बनाई गई है ना तो ये सब ये टर्म समझ में नहीं आया।
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इसमें कोई खास समझने वाली बात थी नहीं। ये जो अल्टीमेट कहा ये जाता है कि ये जो
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पूरी यूनिवर्स है ये जो दुनिया है ये इंसान के लिए बनाई गई है। अच्छा ये सब इंसान के लिए। क्यों साहब?
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सही है ना? बिल्कुल। लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि किसी चीज के पीछे रीज़ आपको नहीं पता तो रीज़न नहीं है। इसे कहते हैं
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मुझे मुझे नहीं पता लेकिन मेरी जिम्मेदारी नहीं है। वो बिल्कुल सही कहा था उसने बट्टन रसल ने आपने उसे मजाक में टाल दिया
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के भाई आप एक दावा कर रहे हैं। मैं क्यों कहूं के ये गलत है दावा। आप प्रूफ कीजिए।
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मेरे पे जिम्मेदारी ही नहीं है। मैंने थोड़ी कहा है। आप प्रूफ कीजिए कि ये सही है।
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आप आर्गुमेंट ऑफ कंटिंजेंसी का जवाब सवाल पूछना चाहेंगे? आप सवाल पूछना चाहेंगे मुफ्ती साहब से
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क्योंकि क्रॉस एग्जामिनेशन का दौर है। आप जैसे पहले बोल रहे थे फेथ को लेके कुछ मैं ये पूछना चाहूंगा कि खुदा ने जो भी
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रेवोलशंस किए हैं एक मजहब के नहीं बहुत से मजहबों में किए हैं। अलग-अलग रेवोलशन है। कहीं कुछ एक बातें हैं। कंट्राडिक्शन भी
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है। आपस में कहीं कुछ आप कर सकते हैं। कहीं कुछ नहीं कर सकते। ऐसा नहीं है कि
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सबकी कोड ऑफ़ मोरल एक है। तो
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ये किस्सा क्या है? अब आप ये देखिए कि मुझे
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कभी-कभी लगता है कि जो फुटबॉल फाइनल होता है लाखों लोग होते हैं। फिर वो टीवी कवर
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करती करोड़ों लोग। अगर उसमें खुदा की एक भूमि आवाज आ जाती मैं गॉड हूं। तो सारे
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लोग अभी सुन लेते और टीवी पे भी सुन लेते किस्सा खत्म होता। ये इतनी राजदारी क्या
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है कि तुम सामने कुछ तो सबूत दे दो हमें। सॉलिड ये कह साहब ये यूनिवर्स कैसे बने?
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इससे मसला क्या हल होगा? मैं पूछूंगा आपसे खुदा कैसे बना? क्यों नहीं पूछूंगा? कैसे
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बना? बल्कि वो तो कायनात से कहीं ज्यादा इंटेलिजेंट है। कायनात से कहीं ज्यादा कम
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जी वो हमेशा से है। सही आप कहेंगे मैं मान लूंगा। अच्छा दोयम वो कादर मुखल यानी
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कादरे मुख का मतलब ओमनीपोटेंट जो चाहे कर सकता है आपको नौकरी दिलवा सकता है आपकी
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अच्छी जगह शादी करवा सकता है आपके पड़ोसी का मुकदमा हरवा सकता है आपको जिता सकता है
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सब काम करता है थोड़ा सा माइक वो इस दुनिया को चला कैसे रहा है
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ये दुनिया कैसे चल रही है आपको इसमें हैरत नहीं होती या कयामत के बाद कभी एक जस्टिस
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होगा जब ये बच्चा मर चुका होगा जिसकी धज्जियां उड़ गई बम से इसको इंसाफ मिलेगा
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तब अच्छा अब जवाब दूं हां जी मैं वही इसीलिए आपकी तरफ
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सबसे पहले आपने रेवोलेशन और स्क्रिप्चर्स की बात की इस पे मैं बात कर सकता हूं लेकिन आज नहीं करूंगा क्योंकि वक्त कम है
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कभी और इस पे डिस्कस करेंगे मैं तैयार हूं उसप भी बात करने के लिए ये अभी से राउंड टू की भूमिका तय हो रही
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है डस गॉड एक्सिस्ट राउंड टू चूंकि आज गॉड के एक्सिस्टेंस पे बात है तो
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मैं उसी के रिलेटेड जो है आपके के सवालात को एंटरटेन भी करूंगा और मैं भी पूछूंगा।
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आपने कहा कि आपने साबित ही नहीं किया जबकि आर्गुमेंट ऑफ कंटिंजेंसी बुनियादी
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आर्गुमेंट है। आप मुझे कॉनंटिंजेंसी का मतलब बताइए। आपका मतलब क्या है? कंटिंजेंसी? कंटिंजेंसी का
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मतलब यह हुआ के हर वो वजूद जो किसी भी चीज का पाबंद है। हर वो वजूद या हर वो चीज जो
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अपने एकिस्टेंस में किसी भी चीज के पाबंद है और उससे बाउंड है। उसको उसकी जरूरत है।
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उस पर डिपेंड करती है। तो जाहिर सी बात है कि उसका कोई ना कोई कॉज होता है। ये तो अक्ल की बात है। ये आप रीजनिंग की बात
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करते हैं। मैं वही कर रहा हूं। दूसरी चीज आपने ये बात कही के इतने बिलियन लाइट इयर्स दूर है उसका मेरा क्या
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लेना देना फिर मेरे ख्याल से आपको ये नहीं कहना चाहिए आई एम आई थिंक देयर फॉर आई एम एन एथिस्ट आपको सोचना चाहिए सिर्फ आप एक
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लिमिटेड दायरे में रहकर नहीं सोचे बल्कि बाहर निकल कर सोचें| आपने तीसरा सवाल किया आपने दो तीन सवाल एक साथ
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ऐसी बातें ना कीजिए कुछ तो को ऐतराज हो जाएगा आप पे कि आप कुछ भी सोचिए ये इजाजत
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आपको है नहीं मुझे है
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जी आप आपने प्रॉब्लम ऑफ इविल के ताल्लुक से सवाल किया और बार-बार आप एक लफ्ज रिपीट
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कर रहे हैं कि ओमनीपोटेंट गॉड है। ऑल पावरफुल गॉड है। यही तो दरअसल समझना है कि
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गॉड का कांसेप्ट क्या है? प्रॉब्लम ऑफ इविल जो है प्रॉब्लम ऑफ इविल दर हकीकत दो
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असमशन पर कायम है। अगर आप इन दो अस्पशनंस को समझ जाएं तो ये प्रॉब्लम प्रॉब्लम नहीं रहेगी। ये आर्गुमेंट आपको समझ में आ जाएगी
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कि ये कोलैप्स कर जाता है। पॉइंट नंबर वन यानी जो आपका सबसे पहला फॉल्स असमशन है कि
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गॉड मर्सफुल है, ओमनीपोटेंट है। दुनिया में जुल्म हो रहा है। लेकिन आपको ये समझना चाहिए कि हमारे वर्ल्ड व्यू के मुताबिक
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गॉड सिर्फ ओमनीपोटेंट और सिर्फ मर्सफुल नहीं है बल्कि वो ऑल वाइज भी है और वो ऑल
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नोइंग भी है। उसके हर काम के पीछे हिकमत और विज़डम है। ये कोई जरूरी नहीं है कि वो हिकमत और विज़डम आपको समझ में आए या मुझे
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समझ में आए। अगर आप जो समझ रहे हैं उसके मुताबिक आप फैसला कर रहे हैं ये लिमिटेड पर्सपेक्टिव से आर्गुमेंट है और इस चीज को
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हम अपनी दुनिया में अपने लाइफ में डेली लाइफ में इस प्रिंसिपल को एक्सेप्ट करते हैं। हम जब किसी डॉक्टर के पास जाते हैं
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डॉक्टर के पास जाकर वो अगर उसने हमें कोई दवाई दी है तो हम ये तो नहीं कहते कि जब तक आपके पास जितना नॉलेज और जितना विज़डम
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नहीं है आपने क्यों ये दवाई दी है तब तक हम इस चीज को एक्सेप्ट नहीं करेंगे। नहीं कहते हम उसकी अथॉरिटी को तस्लीम करते हैं।
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क्यों? क्योंकि उसकी हम जानते हैं कि वो नॉलेजेबल है। वो विज़डम वाला है। हमसे ज्यादा नॉलेज और हमसे ज्यादा विज़डम है।
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बताएं सर। नहीं डॉक्टर में खुदा में बड़ा लिखें। डॉक्टर पढ़ा लिखा होता है। एक तो मैं उसकी
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बात सुनूंगा। दो ये नहीं कुछ जवाब तो ये भी नहीं है। सर प्लीज आप अगर सब ऑडियंस से बोलने
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लगेंगे तो फिर मतलब नहीं इस बहस में। मतलब आप ये कहें कि क्योंकि आप डॉक्टर पे बिलीव करते हैं इसलिए खुदा पे बिलीव
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कीजिए। क्या ये मिसाल आपको समझाने के लिए आर्गुमेंट है इस पे आपको एतराज नहीं है तो
1:06:44
सिंपल बात ये है कि मैं अगर ये यकीन कर लूं कि एक ओमनी पेटेंट उसकी मसलहत है ये
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जो बच्चे मर रहे हैं ये मसलहत है उसकी मुझे नहीं चाहिए थी मसलहत उसकी मसलहत नहीं यही तो समझना है
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मतलब एक्सपीरियंस अच्छा इस आपने अभी मेरी बात पूरी सुनी नहीं मैंने कहा आपका पूरा आर्गुमेंट दो फॉल्स
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फॉल्स असमशन पर है। एक फॉल्स असमशन मैंने बता दिया। दूसरा फॉल्स असमशन ये है कि इस
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दुनिया में इविल के होने का कोई गुड रीज़ नहीं है। जबकि हमारे पास बाज़ रीज़ंस मौजूद हैं। हमारे पास बाज़ वजूहात मौजूद हैं। अगर
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इस दुनिया में इविल ना हो तो आप गुड को डिफाइन कैसे करेंगे? अगर जुल्म ना हो, आप इंसाफ को समझेंगे कैसे? अगर तारीकी ना हो,
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तो आप लाइट को समझेंगे कैसे? बहुत अच्छे। अभी और सुन लें। अभी और बाकी है।
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ये तो बात बहुत पसंद आई साहब मुझे के जब तक रेप ना हो तब तक औरतों की इज्जत का
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ख्याल आप आपने मेरा जवाब पूरा सुना ही नहीं। जब तक के बच्चों का कत्ल ना किया जाए तब तक आपको बच्चों की मासूमियत की इज्जत है।
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आपने पूरा जवाब सुना ही नहीं। क्या बात है? क्या आपने नुक्ता निकाला हुआ? आपने पूरा जवाब सुना ही नहीं। आप सुन लें।
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मेरी बात सुन लें। ये मैंने आपको एक चीज बताई। दूसरी चीज इस दुनिया में हम आए हैं
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टेस्ट के लिए। हमारा टेस्ट हो रहा है और हर इंसान का अलग-अलग अंदाज में टेस्ट होता है और इस दुनिया में अगर इविल मौजूद है तो
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वो इविल जरिया है हमारे अंदर ह्यूमन नोबल क्वालिटीज को डेवलप करने का और अलग-अलग
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फील्ड में प्रोग्रेस करने का और अगर हमारे अंदर और इस दुनिया में इविल नहीं होता तो
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बताइए टेस्ट का मतलब क्या होता है? अगर मैं अपने स्टूडेंट को एमसीक्यूस दूं और उसमें सिर्फ राइट आंसर लिख कर दे दूं और
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कहूं तुम्हारा टेस्ट हो गया। ये मीनिंगलेस है। इस दुनिया में अगर हम टेस्ट के लिए आए हैं तो जाहिर है गुड एंड इविल दोनों मौजूद
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है। तो अगर गुड एंड इविल दोनों मौजूद है तो ये
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इवल भी खुदा का बनाया हुआ है। जी हां खुदा का बनाया हुआ है। लेकिन अच्छा चलो अच्छी बात है। जी बिल्कुल। तो
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अभी अभी तो ये है कि जो मेजॉरिटी है दुनिया में वो इविल है। तो ये खुदा
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एक्चुअली इविल के साइड पे लग रहा है मुझे। बिल्कुल भी मेजॉरिटी में तो वो है।
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क्या बात कर रहे हैं भाई आप कोई भी जो मुसिफ होगा चाहे आपका अपना घर हो जिसके आप
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सबसे बड़े हैं चाहे आपकी ऑर्गेनाइजेशन हो जो आप चलाते हैं वहां पर आप इवल रखेंगे
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साबित करने को कि बाकी लोग शरीफ हैं मेरी बात सुनिए क्या ये आर्गुमेंट ही गलत है कि जब तक कि
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कोई इवल नहीं होगा तब तक के शरीफ आदमी शरीफ नहीं लगेगा अगर एग्जामिनर इ गलत ऑप्शन दे रहा है तो
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एग्जामिनर इविल नहीं हो गया जो गलत ऑप्शन को सेलेक्ट कर रहा है वो फेल होगा क्रिएटर ने इविल को बनाया है लेकिन वो इविल नहीं
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है। सुनिए मेरी बात सर लेट मी कंप्लीट सर क्रिएटर ने इविल को बनाया है टेस्ट के लिए
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वो इविल नहीं है। इविल वो होगा वो होगा जो उसे इख्तियार करेगा। छुरी को बनाने वाला
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गलत नहीं होता है। छुरी का गलत इस्तेमाल करने वाला गलत होता है।
1:09:40
रेप को कैसे गलत इस्तेमाल करते हैं? रेप इंसान के फ्री विल का नतीजा है। माइक
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ये रेप कैसे गलत इस्तेमाल होता है? ये मुझे अब सुन ले। अब सुन ले हां मैं बता रहा हूं। कैसे
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मैं बता रहा हूं। मैं बता रहा हूं कि जो इविल इस दुनिया में मौजूद है। उसके कई
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सारे तरीके हैं। एक तरीका इंसान का अपना फ्री विल है। अब अगर कोई रेपिस्ट रेप कर रहा है तो इसका गॉड का कसूर नहीं है। वो
1:10:05
अपने फ्री विल का गलत इस्तेमाल करना कर रहा है। उसको सजा मिलनी चाहिए। और उसी के लिए जहन्नुम बनाई गई है।
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यह फ्री विल का भी बड़ा चक्कर है। आप जब कोई बुरा काम करते हैं या कोई बुराई होती
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है तो यह कहा जाता है कि ये फ्री विल है। 7 बिलियन फ्री विल्स आर मूविंग ऑन दिस
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प्लेनेट। 7 बिलियन फ्री विल्स। और एक आदमी अपनी फ्री विल से मुझे कत्ल कर दे तो मैं
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खुदा की मर्जी से मरा हूं। क्या इसकी फ्री विल की वजह से? मेरी मौत खुदा के हाथ है या यह फ्री विल
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वाले के हाथ है? खुदा ने फ्री विल का निजाम बनाया है और उस निजाम का गलत इस्तेमाल करके कोई आपको मार
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रहा है। इस्तेमाल करके मेरा कत्ल कर देता है। अब मेरी मौत का जिम्मेदार कौन है? वो इंसान जिम्मेदार है।
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वो इंसान तो ये कहना कि और उसको उसको उसको सजा मिलेगी। तो अब आप आगे चलिए कि ये तय करना कि
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अल्लाह ही या खुदा सॉरी अल्लाह नहीं। खुदा ही जिंदगी देता है और खुदा ही मौत देता है। यह गलत है।
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बिल्कुल गलत नहीं है। हां नहीं निजाम उसी ने बनाया फ्री विल का। निजाम मौत और हयात का उसी ने बनाया।
1:11:04
यू आर कंट्राडिक्टिंग योरसेल्फ। अभी आपने कहा कि एक आदमी ने फ्री विल से आपको मार दिया। इसमें उसे फ्री विल दी गई थी। उसने
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गलत इस्तेमाल किया। 7 बिलियन फ्री विल्स आर मूविंग ऑन दिस प्लेनेट। और आप चाह रहे
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हैं कि मैं सिर्फ खुदा का ध्यान करूं। ये 7 बिलियन फ्री विल्स को मुझे लुक आफ्टर करना पड़ेगा कि नहीं? ये तो तबाहियां कर
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रही हैं और तबाहियां ज्यादा हो रही हैं। बिल्कुल। तो अगर आप बताएं आप बताएं अगर
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खुदा नहीं है फॉर एग्जांपल तो आप इविल को कैसे डिसाइड करेंगे? यानी हाउ कैन यू
1:11:35
डिफाइन इविल ऑब्जेक्टिवली विदाउट गॉड? इविल को डिफाइन।
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देखिए दुनिया में दो तरह के जानवर है। एक जो अकेले रहते हैं जंगल में और एक जो
1:11:48
ग्रुप्स में रहते हैं। ग्रुप में जो भी रहेगा चाहे वो आपका
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फाउंडेशन हो, चाहे कोई क्लब हो, चाहे कोई पिटिकल पार्टी हो, चाहे कोई यूनिट हो,
1:12:01
उसमें आपको इंटलेक्ट करने के रूल बनाने पड़ेंगे। यानी लोग तय करेंगे।
1:12:06
लोग तय करेंगे। अगर लोगों ने यह तय किया कि किसी का रेप करना सही है, आप जस्टिफाई करेंगे। नहीं आपका फाउंडेशन तो यह हो गया ना कि लोग ई
1:12:13
विल डिसाइड करेंगे। नहीं नहीं अरे दुनिया में ऐसे ग्रुप्स हैं
1:12:20
जो रेप को जायज मानते हैं सर्टन हालात में। मैं डिटेल में नहीं जानूंगा। आप भी
1:12:27
जानते हैं। ये जो आईिस वाले थे जिन्होंने क्या किया था? तो
1:12:32
उन्होंने क्या किया? उसका खुदा से कोई ताल्लुक नहीं है सर। मैंने सिंपल सवाल किया कि इविल को आप डिफाइन करते कैसे हैं?
1:12:37
आइए वापस आइए। जी आप साथ में तभी रह सकते हैं जब कुछ आप ऐसे
1:12:44
उसूल डेवलप करें जिसमें हर एक का बेसिक तहफुल हर एक का बेसिक राइट हो और हर एक को
1:12:49
कोई आराम मिले। यही तरीका है किसी भी ऑर्गेनाइजेशन जिसमें एक से ज्यादा लोग हैं
1:12:56
और वो ऐसे चलती है जिंदगी। उसमें अगर आप गड़बड़ करेंगे तो तबाही होगी, नुकसान
1:13:02
होगा, बर्बादीियां आएंगी। और अगर उसमें आप घर ले लीजिए ना एक हस्बैंड है, एक वाइफ
1:13:08
है, बच्चे हैं, वालिदा भी हैं, दो बहनें भी है, एक भाई भी है। अब इसमें कोई निजाम
1:13:14
आपको चाहिए साथ में रहने का। और एक दूसरे पे भरोसा रहे। एक दूसरे के बही ख्वा हो,
1:13:20
एक दूसरे की मदद करें। ऐसी जिंदगी सर आपकी बात आ गई। आप ये कह रहे हैं कि लोग डिसाइड करेंगे क्या सही है क्या गलत
1:13:26
है। यही है मेजॉरिटी डिसाइड करेगी क्या सही है क्या गलत है। अरे भाई बिल्कुल मेजॉरिटी अगर ये कहे कि नाज़ जर्मनी के साथ
1:13:33
जिस तरह मेजॉरिटी थी कि जेनोसाइड करना सही है आप जस्टिफाई करेंगे उस वक्त उस वक्त
1:13:40
आपका आपका ये सवाल सिर्फ उसके बाद क्लोज कर हां उस वक्त प्लेनेट पे जो लोग थे उनमें
1:13:45
कितने लोग हिट को सही समझते हैं अच्छा प्लेनेट की मेजॉरिटी तय करी सोसाइटी की नहीं प्लनेट की मेजॉरिटी गॉड के
1:13:51
एक्सिस्टेंस को सही मानती है आप क्यों नहीं मानते
1:13:58
ये हेलो हेलो हेलो ये क्रॉस क्वेश्चन का
1:14:03
राउंड यहां पर समाप्त होता है और ये बड़ा अच्छा है कि इस तरह से फ्रेगमेंट कर दिया गया है ताकि जो मरकरी ऊपर जा रहा है नीचे
1:14:11
जी प्लेनेट की ज्यादातर मेजॉरिटी कुछ दूसरे मजहबों के खुदा को मानती है
1:14:19
नहीं आप तो मेजॉरिटी की बात कर रहे हैं आप ये कह रहे हैं इविल और गुड को डिसाइड
1:14:24
मेजॉरिटी करेगी मेजॉरिटी जो कर दे वो सही हो जाएगा इसको जैसा आप ही लोगों ने तय किया है उसी
1:14:30
फॉर्मेट को फॉलो कर लेते हैं। भाई मैंने तो भले लोगों पे ऐतबार किया
1:14:36
प्रथम मॉडरेशन तय किया। जी आपके पास 5 मिनट का वक्त है क्लोजिंग आर्गुमेंट है।
1:14:41
उसके बाद हम ऑडियंस से क्वेश्चन आंसर लेंगे जावेद साहब के क्लोजिंग आर्गुमेंट के बाद। ओके टाइम स्टार्ट। बहुत शुक्रिया।
1:14:47
हमारा जो टॉपिक है डस गॉड एक्सिस्ट? मैं इस पे इतने एकेडमिक तैयारी करके आया था।
1:14:53
मुझे था कि मैं मैंने सोचा था कि कई सारे मैं आर्गुमेंट्स दूंगा। लेकिन वक्त की भी किल्लत और जावेद साहब बार-बार इधर-उधर चले
1:14:59
जा रहे थे तो उसको भी थोड़ा एंटरटेन करना पड़ गया। डस गॉड एक्सिस्ट पे मैं एक ही आर्गुमेंट दे पाया। आर्गुमेंट्स बहुत हैं
1:15:06
और डेफिनेटिव आर्गुमेंट्स हैं और मेरे आर्गुमेंट को किसी एक राउंड में भी इन्होंने एंटरटेन नहीं किया और रेफ्यूट
1:15:12
नहीं किया है। एक राउंड में भी नहीं। एक राउंड में भी नहीं। और ना ही
1:15:17
अभी अभी आपका क्लोजिंग आर्गुमेंट आएगा। बता देना। आर्गुमेंट ऑफ कंटिंजेंसी सर। अरे मैं आपसे कई बार कह चुका हूं
1:15:23
कंटिंजेंसी का मतलब अब मैं कैसे समझाऊं आपको? आपस में हां आप और कितने आसानी से समझाऊं मैं मुझे तो
1:15:28
नहीं समझ में आ रहा है। आप अपनी कंटिजेंसी उर्दू में बोल सकते हैं
1:15:33
आप अपनी बात पूरी कर लें। आखरी चार मिनट में दूसरी चीज जस्ट अ मिनट प्लीज मैम कैन आई टॉक?
1:15:43
दूसरी चीज ये है कि आपने एक तो इसका जवाब नहीं दिया। दूसरा आपने गॉड के ना होने पर
1:15:48
कोई डेफिनेटिव आर्गुमेंट नहीं दिया। सिर्फ मजहब पे बात कर रहे हैं आप। मजहब तो आज हमारा टॉपिक ही नहीं था। आज तो हमारा
1:15:54
टॉपिक आप मजहब से ले लेकर आईएस आईएस तक चले गए। भाई हमारा क्या ताल्लुक है उससे? वी कंडेम देम। और उसका गॉड से क्या
1:16:01
ताल्लुक है? अगर कोई गलत काम कर रहा है। किसी ने किसी को कत्ल किया, किसी ने किसी का रेप किया उसको सजा मिलनी चाहिए। और
1:16:07
आपके पास कोई भी कोई भी रैशन स्ट्रांग फाउंडेशन ऑफ मोरालिटी नहीं है। आपने कहा
1:16:14
कि मेजॉरिटी तय करेगी सोसाइटी की वो सही होगा। मैंने कहा हिटलर को फिर आप सही कहेंगे। नहीं नहीं नहीं प्लनेट की सोसाइट
1:16:21
की मेजॉरिटी तय करेगी। तो प्लनेट की मेजॉरिटी गॉड के एक्सिस्टेंस को मानती है। आप कह रहे हैं ये रिलीजियस है। तो यानी
1:16:26
आपके पास कोई स्ट्रांग फाउंडेशन नहीं है ऑब्जेक्टिव मोरालिटी का। ऑब्जेक्टिव मोरालिटी का अगर कोई फाउंडेशन है तो वो
1:16:33
सिर्फ गॉड है। गॉड है, गॉड है। थैंक यू। जी। ये मुफ्ती शमाइल नदवी साहब का
1:16:41
क्लोजिंग आर्गुमेंट था। अब हमारे पास जी मैं जी
1:16:47
ये बड़ा अच्छा है कि दोनों लोगों को मॉडरेटर से शिकायत भी और बोल रहे है भाई
1:16:52
हमारी शाबाशी भी तो करते चलो अब मेरी बात जी आपके पास जावेद अख्तर साहब 5 मिनट का
1:16:59
वक्त है ये आपका क्लोजिंग आर्गुमेंट है टाइम रिसेट कर दें
1:17:04
देखिए बहुत सारी बातें हैं। गॉड का डेफिनेशन दुनिया के किसी भी रिलजन में है कि वो पोटेंट है। वो प्रेजेंट है। ही इज़
1:17:11
जस्ट ही इज़ काइंड। ही लव्स यू एंड सो ऑन। मैं जब दुनिया देखता हूं तो मुझे कोई ऐसा
1:17:18
सुप्रीम पावर यहां दिखाई नहीं देती है जो इंसान की बेहबूती के लिए कुछ कर रही हो।
1:17:24
कमजोर को बचा रही हो, मदद कर रही हो, जालिम को पीछे हटा रही हो। मैं नहीं देखा। तारीख में नहीं। एक तो अगर है और ये देख
1:17:32
रहा है तमाशा तो उसका होना ना होना बराबर है। दो ये कि
1:17:39
ये जो है जब आप ये कहते हैं कि कायनात जिसकी कंटिंजेंसी है मैं देखिए लफज़
1:17:45
इस्तेमाल किया है। तो ये कैसे हो सकती है? और फ़ौरन आप सरेंडर कर देते हैं कि जाहिर
1:17:52
है कि इसका बनाने वाला तो इससे 10,000 गुना ज्यादा कॉम्प्लिकेटेड होगा। उस पे आपके होने पे कोई ऐतराज नहीं है। उसे वो
1:18:00
टाइमलेस है। वो पहले से था। टाइम तो बहुत बाद में आया। ये सब आप मानने को तैयार है।
1:18:05
जिसका आपके पास कोई सबूत नहीं। आपके पास कोई रीज़ नहीं है। आपकी तारीफ़ क्या है
1:18:10
मजहबों की? बिलीफ की जो खुदाओं का बिलीफ है, ये कास्टेंटली गलत साबित होता रहा है।
1:18:16
मतलब आप कहें कि एस्टोटिस के जमाने में तो सब जाहिल थे। वो भी इतने ही यकीन से खुदा
1:18:21
पे यकीन रखते थे जो अब नहीं रहा। यह भी नहीं रहेगा। आप लिख लीजिए और इसके
1:18:29
आसार आपको दुनिया में दिखाई देना शुरू हो चुके हैं। ये बहस क्या आज से 100 साल पहले
1:18:35
इस तरह हो सकती थी? यहां तक तो आपको हम ले आए हैं। तो
1:18:43
सर सर अरे इनको मदद की जरूरत नहीं भाई। ये सेल्फ सफिशिएंट आदमी है। आप क्यों इनकी मदद कर
1:18:49
रहे हैं? माफ़ नहीं कर सर सर सर सर प्लीज प्लीज तो ये जो है तमाम बातें अपनी जगह है ये एक
1:18:56
पैकेज है आप अकेले कोई आदमी ऐसा नहीं है जो सिर्फ गॉड को मानता हो उसके साथ बहुत
1:19:01
पैराफनेलिया आता है अलग-अलग पैराफनेलिया आते हैं दे आर ओनली दे हैव ऑलवेज क्रिएटेड
1:19:08
कस इन द सोसाइटी मैं तो आपको सीधा ऑफर देता हूं कि दुनिया में 10 इंपॉर्टेंट
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बिलीव्स है आप एक मानते हैं नौ नहीं मानते नौ में आप एथिस्ट है। नौ को आप बिलकुल
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रीज़नेबली मेरी तरह देखते हैं तो 90 मजहबी आदमी भी 90% एथिस्ट है। वो
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दूसरे खुदा नहीं मानता। एक खुदा मानता है अपना वाला बाकियों को कहता है गलत है।
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अगर आप मानना ही बंद कर दे तो आपका 10% चांस है कि आप सही है और 90% चांस है कि आप गलत हैं। मेरा मशवरा है आप मानना छोड़
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दिए तो 50% चांस होगा कि आप सही हैं और 50% चांस होगा। 40% आप गेन करेंगे बाय
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बिकम एन एथ।
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ये एक फसूदा ख्याल है। ये खत्म हो रहा है। हो सकता है मेरी जिंदगी में ना हो। लेकिन
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ये हो जाएगा। जो बातें ये इनको आप मेटाफिजिकल ये वो ऐसे रिस्पेक्टेबल टर्म
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दे दीजिए। ये तो उन लोग के हैं जिन्हें ना फिजिक्स मालूम थी ना मेटा मालूम था। ये उन्होंने आपको दिए हैं।
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जी बहुत शुक्रिया आप दोनों लोगों का और अब इस बातचीत का आखिरी राउंड शुरू होगा डस
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गॉड एक्सिस्ट की यह बहस मुफ्ती शमाइल नदवी और जावेद अख्तर साहब के बीच आप लोग अपने
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अपने हाथ ऊपर करेंगे मैं यहां से तय करूंगा और माइक हमारे पास है क्या एक ही
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माइक है ऑडियंस के लिए दो माइक है एक इस तरफ एक इस तरफ ठीक है तो जी सबसे पहले
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हमारी सहयोगी है मारिया मारिया शकी जी पूछिए सवाल थोड़ा सा रुकेंगे ताकि कैमरे
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का फ्रेम आप पर आ जाए। आपकी तो प्रैक्टिस है टीवी की। जी नदवी साहब मैं खुदा को मानती हूं। पहले
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मैं इसी प्रमाइस से शुरू कर रही हूं और ये बता रही हूं आपको। मैं मानती हूं। लेकिन
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कुछ-कुछ सवाल हैं जो जावेद साहब ने उठाया। उसका जवाब आपको देना चाहिए। पहला सवाल ये
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के गजा में सालों से छोटे बच्चे मर रहे
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हैं वो उनको अगर खुदा मर्सफुल है हम मानते हैं कि अल्लाह ताला में बहुत ताकत है तो
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वो बच्चे क्यों मर रहे हैं? दूसरी बात ये कि अगर कंटिंजेंसी की जो आप बात करते हैं
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पूरे मुस्लिम मुालिक मिलकर के भी उन गजा के बच्चों को क्यों
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नहीं बचा पा रहे हैं? क्योंकि अगर वो चाहते क्योंकि अल्लाह ताला उन पर हुकूमत
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करते हैं। सब पर हुकूमत करते हैं तो वो उनको क्यों नहीं बचाते? जी थैंक यू। थैंक यू वेरी मच। बहुत अच्छा किया। आपने
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इस चीज को जिक्र कर दिया। मैं इसको और अच्छे से एक्सप्लेन करने की कोशिश करता हूं। देखें जहां तक आपने कहा कि गज्जा के
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बच्चों को मारा जा रहा है। देखिए दो वर्ल्ड व्यू है। एक एथिस्टिक वर्ल्ड व्यू है, एक थिस्टिक वर्ल्ड व्यू है। बच्चे मर
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रहे हैं दोनों वर्ल्ड व्यू में। लेकिन हमारा वर्ल्ड व्यू कह रहा है कि रिकंपेंस है। यह कह रहे हैं कि उनका मर उनका मरना
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बेकार जाने वाला है। कोई उसका रिकंपैेंस नहीं है। क्योंकि इनके यहां आखिरत और अल्लाह का कोई तसवुर या गॉड का कोई तसवुर
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नहीं है। आपने ये सवाल किया कि गॉड मर्सफुल है। क्यों नहीं रोकता? ये मैंने बताया कि ये मिसकंसेप्शन है लोगों के
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दरमियान कि गॉड को सिर्फ मर्सफुल और ओमनीपोटेंट समझते हैं। गॉड के सिर्फ यही दो एट्रिब्यूट्स नहीं है। गॉड के कई सारे
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एट्रिब्यूट्स हैं। उनमें से अल हकीम भी है। उनमें से सॉरी ऑल ऑल ऑल वाइज भी है।
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ऑल नोइंग भी है। लिहाजा अगर इस दुनिया में किसी को तकलीफ आ रही है और गॉड उसको नहीं
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रोक रहा है। वो इसलिए नहीं रोक रहा है क्योंकि इंसानों को फ्री विल दिया गया है। ठीक इसी सुनिए सुनिए। ठीक इसी तरीके से
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अगर एक डॉक्टर किसी छोटे बच्चे को इंजेक्शन लगा रहा है उसे तकलीफ पहुंच रही है। उसके लिमिटेड पर्सपेक्टिव के ऐतबार से
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ये गलत हो रहा है और डॉक्टर बुरा है। लेकिन जब आप ब्रॉडर पिक्चर को देखेंगी
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आपके और हमारे पास सिर्फ एक पिक्सल है। हमें इतना नजर आ रहा है कि गज्जा में कत्ल हो रहा है। लेकिन इसके पीछे कितना रिकमेंस
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उनको मिलने वाला है। पूरा पिक्चर गॉड के पास है। तो एक पिक्सल से आप पूरे पिक्चर को कभी भी जज नहीं कर सकते।
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आप आप इसमें कुछ जोड़ना चाहेंगे? आपको कुछ बोलना है इसमें? मैं ये बोल रहा हूं
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भाई आपने बहुत अच्छा जस्टिफिकेशन दिया ये आप वो जो वहां के प्राइम मिनिस्टर है इजराइल के उन्हें भेजिए वो बहुत खुश होंगे
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आप जस्टिफिकेशन दे देना कि अगर गॉड नहीं है तो बच्चे क्यों मर रहे हैं आप बताएं वो ये सवाल पूछ रहे हैं कि अगर आप ईश्वर
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का अस्तित्व नहीं मानते हैं तो उन बच्चों की मौत को आप कैसे इंटरप्रेट करते हैं?
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भाई यह दुनिया जो है जो ताकतवर लोग होते हैं वो एक नाइंसाफी करते हैं।
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तो यह अच्छा काम है। आपके नजदीक तो नेचर नाइंसाफी पे मबनी है। अरे मेरे भाई आप नेचर की कहां बात कर रहे
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तो इंसान की बात तो फिर जब मैं इंसान की बात कर रहा था आप नेचर की बात करने लग गए। क्रॉस एग्जामिनेशन अब मुझे बोलने नहीं
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देंगे तो अलग बात है। आप बोलिए मैं मुझे कोई जल्दी नहीं। नहीं ये क्रॉस एग्जामिनेशन
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मुझे बोल तो लेने दीजिए। ठीक है बात? बात ये है कि ह्यूमन सोसाइटी तभी साथ में
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रह सकती है जब वो मोहब्बत से एकता से एक दूसरे के एतराम करके रहे। इसके अलावा
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पॉसिबल नहीं अकेले तो इंसान रह नहीं सकता। वहां पर कुछ लोग हैं जो फाउल करते हैं। वो
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फाउल हम हमेशा से तारीख में होता आया है। आज ये हो रहा है जो हो रहा है बहुत बुरा
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हो रहा है। बहुत जालिमाना है। बहुत जाबराना है। उसको आप कहे कि ये बच्चों को
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कंपनसेशन मिल जाएगा या इसकी इंजेक्शन है। इंजेक्शन तो हेल्थ के लिए दिया जाता है।
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आप ये कह रहे हैं कि ये बच्चों की जो धज्जियां उड़ रही है। ये इंजेक्शन है। ये टेस्ट है। यह टेस्ट है और उस टेस्ट में
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उनको उनको ऐसा रिकम्पेंस मिलेगा जो आपके तसवुर के बाहर है। ये आप तीन बरस के बच्चे को बारूद से उड़ा
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के टेस्ट ले रहे हैं। वाह! वो नहीं ले रहा है। खुदा नहीं उड़ा रहा है। इजराइल उड़ा रहा है। उसको अगला सवाल लेते हैं। अगला सवाल लेते
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हैं प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल। मुफ्ती साहब एक निवेदन आपसे है कि कम से कम
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थोड़ा सा माइक क्लोज। एक रिलीजियस और फिलोसफिकल कर रहे हैं। कर रहे हैं। कर मैम मैम प्लीज।
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एक रिलीजियस और फिलोसफिकल ट्रेडिशन है। जो ब्रह्मांड को यानी यूनिवर्स को ही
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अंतिम मानती है। सर्वम खलदम ब्रह्मम दिस इज छंदो उपनिषद एंड इट कंप्लीटली रूल्स
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आउट द एकिस्टेंस और नेसेसिटी आपके शब्दों में नेसेसिटी ऑफ अ क्रिएटर द क्रिएशन
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इटसेल्फ इज द क्रिएटर। तो एक मिनट प्लीज दूसरा जो सवाल आपने अभी जो आप बार-बार कह
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रहे हैं कि भगवान विद्वान भी है वाइज सब जानने वाला। तो अगर विज़डम में दुनिया भर
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के पापों और अत्याचारों को बर्दाश्त करना शामिल है तो फिर इसका मतलब ये हुआ कि अगर
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मैं फ्री विल से उसको अपोज करता हूं तो ईश्वर की विज़डम और मेरी फ्री विल में कंट्राडिक्शन है। बिकॉज़ व्हेन आई एम
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अपोजिंग व्हाटएवर हैज़पनिंग इन गाजा देन आई एम अपोजिंग दी गॉड्स विल और गॉड्स विज़डम
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जवाब लेते हैं। क्योंकि तो गॉड की विज़डम में एक मिनट सौरभ प्लीज सर ये एक एक जुमला गॉड की विज़डम है
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कि गाजा में जो कुछ हो रहा है वो हो रहा है। मैं उसको अपोज कर रहा हूं। तो मैं गॉड की विज़डम के खिलाफ जा रहा हूं। एक सवाल।
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दूसरा यह नहीं नहीं आपने दो ऑलरेडी। एक सर सर आप और सवाल कर लें लेकिन मुझे दो जवाब दे
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रहे हैं। पहले आपने ये कहा सुनिए मेरी बात सुनिए। भाई इजराइल के मुताबिक तुम्हारा ठीक हो रहा है ना?
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नहीं नहीं हो रहा है। ठीक नहीं हो रहा है। मैं बता रहा हूं क्या हो रहा है। आप तशरीफ़ रखिए। मैं बता रहा हूं क्या हो रहा है। लेट मी कंप्लीट प्लीज।
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एक सेकंड गाइज़ एक सेकंड। यह देखिए ऐसा है कि यह सब बड़ा आपस में विचार विमर्श के
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बाद यह तय हुआ था कि कुछ नियम बना लिए जाएं ताकि एक टाइम बाउंड बातचीत चले और
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भाई साहब आप बड़ा जरूरी काम कर रहे हैं लेकिन कैमरे के फ्रेम में आके उस काम को गड़बड़ कर दे रहे हैं। ठीक है गुरु अब
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मेरे को कहीं का गुस्सा कहीं निकालना था। सॉरी नहीं कोई गुस्सा नहीं है। जी तो प्रोफेसर
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ने सवाल पूछे आप उनके जवाब दें। और थोड़ा ये सब लोग थोड़ा ख्याल रखें भाई। सवाल संक्षिप्त रखें।
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आपने दो सवाल किए। सबसे पहला यह कहा कि हमारे पास यह कांसेप्ट है कि ये यूनिवर्स
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खुद नेसेसरी बीइंग है। क्रिएशन इटसेल्फ इज द क्रिएटर। हाउ इरशनल इज दिस? कि मैं
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एक्सिस्ट करूंगा बाद में लेकिन अभी एक्सिस्ट कर भी रहा हूं। यानी एक ही टाइम में एक्सिस्ट भी कर रहे हैं, नहीं भी कर रहे हैं। दिस इज नॉट ट्रू। दूसरी चीज आपने
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कहा कि अगर इजराइल में सॉरी माफ कीजिएगा। इजराइल डजंट एक्सिस्ट ऑक्यूपाइड पेस्टाइन
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में अगर
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अगर ऑक्यूपाइड पैलेस्टाइन में बच्चों को मारा जा रहा है फ्री विल की वजह से और गॉड
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नहीं रोक रहा ये कंट्राडिक्शन है ये बताइए कि एक एग्जाम में एक बच्चा गलत आंसर लिख रहा है सुनिए एग्जामिनर चाहे तो रोक रोक
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सकता है क्यों नहीं रोक रहा है जो ये कंट्राडिक्शन है या कंट्राडिक्शन नहीं है
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सर माइक नहीं सर ये आपस में ये क्या आपका सवाल माइक पे माइक पे माइक
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माइक दीजिए। फ्री विल दिया गया है टेस्ट के लिए अकाउंटेबिलिटी के लिए। अगर फ्री विल नहीं
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होता तो आप कहते हमें रोबोट बना दिया गया। कैन नॉट रिप्रेजेंट माय पोजीशन। आपकी जो भी पोजीशन मैं अपनी फ्री विल के नाते अपने
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ह्यूमन विज़डम के नाते गाजा में हो रही अत्याचार का विरोध करता हूं। बिल्कुल करना चाहिए। के हिसाब से मैं गॉड की विज़डम का विरोध कर
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रहा हूं। बिल्कुल नहीं। हो रहा है गॉड। बिल्कुल भी नहीं। बिल्कुल भी नहीं। उसका वहां पर गाजा में
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कत्ल होना यह इंसानों के गलत इस्तेमाल का नतीजा है। फ्री विल के इस्तेमाल का नतीजा
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है। गॉड इसको गॉड इसका हुक्म नहीं देता। उससे रोकता है। यही तो मसला है ना आपके लिए कांसेप्ट क्लियर है।
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नहीं नहीं भाई आपने तो बताया था इंजेक्शन लगाने से बच्चे को तकलीफ होती है। ये इंजेक्शन लगाने सर आप ऐसे रेटोरिक स्टेटमेंट दे तब तो कोई
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मसला नहीं समझते रहेंगे। दिस इज अ रेटोरिक स्टेटमेंट। दिस इज नॉट अ लॉजिकल आर्गुमेंट सर। आई एम सॉरी। आई एम सॉरी। आखिरी 30
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मिनट बड़े मुश्किल होने वाले हैं। जी मुफ्ती साहब आगे बैठे हैं। इनको माइक दीजिए। हां तरुण माइक आप अपने पास रखिए। आपको
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कैमरे का फ्रेम पता है। जी सबसे पहले दोनों को मुबारकबाद। एक सर अपना आप नाम बता दें। आप अमेरिका
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में शिकागो में रहते हैं। इतना मुझे याद है। बताएं आप। यासिर नतीम अलवाजदी मेरा नाम है। जावेद सर आपसे एक क्वेश्चन है
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इंफिनिटी रिग्रेस के ताल्लुक से। एक हाइपोथेटिकल सिनेरियो है। मसल अगर आप सर माइक थोड़ा सा प्लीज क्लोज रख। अगर आप
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शायर इसलिए हैं कि आपके कोई उस्ताद शायर थे और वो इसलिए शायर थे कि उनके कोई उस्ताद शायर थे और इसी तरीके से हम माज़
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में पीछे चलते चलते चले जाए और कहीं ना रुके तो माफ़ कीजिएगा आप कभी शायर नहीं हो सकते। लेकिन आप शायर हैं। आपका शायर
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एक्सिस्ट करता है। इसका मतलब यह है कि आप कहीं ना कहीं रुके हैं। तो मेरा सवाल यह है कि क्या आप इनफिनिट रिग्रेस ऑफ कॉजेस
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को लॉजिकल फैलेसी मानते हैं या नहीं मानते? हां या ना?
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मैं इन्हें लॉजिकल फैलेसी नहीं मानता हूं। लेकिन मैं मेरा प्रॉब्लम यह है कि जब मैं
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नहीं मानता हूं तो आई विल कंटिन्यू विद दिस लॉजिक जो फैलेसी नहीं हो। आप एक जगह
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रुक जाते हैं जाके। आप कहते हैं ये गेंद कैसे बनी? ये जजीरा कैसे बना? ये समंदर
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कैसे बना? ये जमीन कैसे बनी? और अचानक गॉड पे जाके आपको ब्रेक लग जाता है। एक बार आप
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सवाल नहीं करते कि भाई इनको बनाने वाला तो इनसे भी कॉम्प्लिकेटेड होगा। वो कैसे बना?
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उसके बारे में आपने इत्मीनान कर लिया। वो हमेशा से है। तो अगर आप उसे हमेशा से मानते हैं तो फिर ये मान लीजिए कि कायनात
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हमेशा से क्या तकलीफ? फिर हम वजूद में नहीं आते। जी हैं। हम मौजूद नहीं। अच्छा सर सर सर।
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क्यों नहीं होते? मैं बताऊंगा प्लीज प्लीज। जैसे मैंने मिसाल दी आपके शेर। आपका शेर कभी वजूद में ना आता। अगर शायद
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इसी तरह चलता रहता हमेशा। जी माइक माइक। मेरे ख्याल से इनफिनिट रिग्रेस का कांसेप्ट क्लियर नहीं हो पाया। ऐसा रहने
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दे। लेट्स मूव ऑन। ठीक है। हां। थोड़ा सा मॉडरेटर का भी ख्याल रखें। नहीं नहीं आपने तो रखा है। आपने रखा
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है। यहां पे गौहर रजा साहब हैं। वो भी एक सवाल पूछना चाहते हैं।
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माइक या नहीं तो ऑन करिए। नहीं
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पहले तो ये कह दूं के मैं उन बच्चों से शर्मिंदा हूं जिनको गजा
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में कत्ल किया गया। क्योंकि हमारे होते हुए कत्ल किया गया।
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लेकिन उससे ज्यादा शर्मिंदगीगी इस बात से हुई कि मुझे लगा कि मुफ्ती साहब उसको
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जस्टिफाई कर रहे हैं। बिल्कुल भी नहीं आप आप गलत मुझे लगा मैं गलत हो सकता हूं। गलत मैं सवाल पूछ रहा
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हूं। सवाल मैं सवाल पूछ रहा हूं। एक मैं जावेद भाई से डिसए्री करता हूं। एक सेकंड
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देखिए अगर देखिए ऐसा एक सेकंड आप सर वेट वेट अरे आप मैं कुछ मेरे पहले
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मुझे अपनी बात कह लेने दीजिए। अगर ऑडियंस तय करेगी तो फिर मॉडरेटर का मतलब नहीं। मेरा आप सबसे यह कहना है यह बहस दो लोगों
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के बीच में है। एक तरफ मुफ्ती साहब, एक तरफ जावेद साहब। पिछले डेढ़ घंटे से ये
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लोग अपने-अपने तर्क रख रहे हैं। आपकी इनसे इत्तेफाकी हो सकती है, ना इत्तेफाकी हो
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सकती है। मेरे उस्ताद मुझे सिखा गए हैं कि, मुखा मुखम में असहमति की गुंजाइश बची
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रहनी चाहिए। अगर मैं आपकी बहुत इज्जत करता हूं गौर साहब। आपने जो कमाल की किताबें
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लिखी साइंटिफिक टरामेंट लेकिन मेरी ये गुजारिश है आप सबसे कि यदि आप इन लोगों ने
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जो बोला उनप टिप्पणियां करेंगे तो ना वक्त की पाबंदी रहेगी ना वो अनुशासन। आप सवाल
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पूछ लें। उस सवाल में जो बात आ जाए वो आ जाए। मैं जावेद साहब से डिसएग्री करता हूं। इसलिए जावेद साहब से सवाल पूछ रहा
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हूं। आपका सवाल जावेद अख्तर साहब से। और सवाल ये है मेरा कि जावेद साहब ने कई बार लॉजिक
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का इस्तेमाल किया कि साइंस में लॉजिक है और रिलजन में लॉजिक नहीं है। मेरा ख्याल
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ये है कि रिलजन में भी लॉजिक है। लेकिन उस लॉजिक की बेसिस ये है कि आप रुक जाते हैं
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जिसका जिक्र जावेद साहब ने बार-बार किया। यानी खुदा के तसवुर पे आते हुए गॉड के तसवुर पे आते हुए रुक जाते हैं। और इसके
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इसमें सवाल पूछना मतलब फॉरबिटन होता है। सवाल यह है कि क्या जावेद साहब इससे एग्री
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करते हैं कि साइंस की लॉजिक अलग है और रिलीजन की लॉजिक अलग है?
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बताइए सर। देखिए तीन चीजें हैं। साइंस है, एक है
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मंतिक है, इस्तेदारल है। और एक जो है कुछ भी नहीं है, फेथ है, अकीदा है। मैं अकीदे
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के लॉजिक का कायल नहीं हूं। मुझे आप इ्तदाल से, लॉजिक से, रीज़्म से समझाइए।
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मैं मानने को तैयार हूं। मेरा क्या नुकसान होगा? लेकिन ये के अकीदे पे मैं नहीं जा
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सकता हूं। अकीदे का मतलब है कि तुम ये मान लो सवाल ना करो। ये नहीं। आप सारी बातें
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करके, बड़ी साइंटिफिक बातें करके एक जगह जाके खुदा के हुदूद पे रुक जाते हैं। सरेंडर कर देते हैं। मैं सरेंडर करने को
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तैयार नहीं हूं। दैट्स ऑल। जी। ये आगे सर बैठे हुए हैं। इनको माइक दीजिए। भाई वो वो आप पूछना चाह रहे थे ना
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भाई हां नहीं मैं ये थैंक यू जी आपका नाम आसिम इफ्तार आसिम जी पूछिए
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सर जावेद सर से सवाल है कि आपने अपने क्लोजिंग माइक थोड़ा करीब आपने क्लोजिंग स्टेटमेंट में ये बात कही
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थी के मजहब का जो फ्यूचर है वो अब ज्यादा दिन नहीं जाने वाला है लेकिन मैं देख पा
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रहा हूं कि जो ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक स्टडी है 2011 में हुई है जिसके 50 एकेडमिशंस ने इसको अंजाम दिया था उसमें वो
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ये कहते हैं के जो फथ इन गॉड है वो इनबिल्ट है ह्यूमन नेचर के अंदर जिसको हम
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कहते हैं फितरत के अंदर शामिल है वो और वो ये कहते हैं कि अगर कोई ये समझता है के
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मजहब को वो खत्म कर देगा तो ये उसकी गलतफहमी है तो आप इसके बारे में इस स्टडीज
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के बारे में क्या कहते हैं ठीक है मैं उनसे एग्री नहीं करता हूं वो कौन से प्रोफेसर होंगे ऐसा
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उनके पास डाटा है इन्होंने डाटा के होगा डाटा क्या हो सकता है फ्यूचर का डाटा तो नहीं हो सकता ना उनके पास प्रेजेंट का
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डेट डाटा हो सकता है। डाटा आपने सुना 100 साल पहले का बाद का डाटा मैंने तो नहीं
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सुना तक तो आज उनकी ये राय है और होगी राय है। ठीक है। दुनिया में तरहतरह की राय है
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लोग। लेकिन मैं समझता हूं कि वक्त के साथ इंसान ज्यादा से ज्यादा रीज़नेबल और लॉजिकल
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होता जा रहा है। आज आप देखिए वेस्टर्न यूरोप में क्या परसेंटेज है नॉन बिलीवर्स
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की। बहुत हाई। वहां चर्च खाली पड़े होते हैं। तो अल्टीमेटली
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तो इंसान कोई ऐसी बात बहुत अरसे तक नहीं मान सकेगा चाहे गलत या सही जो उसे उसके
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दिमाग को उसके ज़हन को उसके लॉजिक को अपील ना करे। वो कह रहे हैं तो ऑफर्ड के होंगे
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तो कैमरेज के होंगे तो मुझे क्या लेना देना? उनका डाटा मुस्तकबिल का नहीं हो सकता है।
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जी दीपक हां पूछिए। मैं आऊंगा अभी पीछे की साइड भी आऊंगा। माइक वहीं भेजूंगा दो-तीन
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साल के लिए। जी। जावेद साहब आपसे सवाल है। नमस्ते। अरे भाई सर अगर आप ही लोगों को तय करना है तो फिर
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सब फिर 200 लोग तय कर लेंगे। नहीं सर प्लीज डोंट डू दिस सर। सर एवरीबडी हैज़ अ राइट सर। बट वी कैन ओनली टेक सिलेक्टेड
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क्वेश्चंस। सर ये यंग लोग भी हैं तो इनकी ये आप उतने यंग भाई आप यंग है कि नहीं है?
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वो कह रहे हैं वो भी यंग है साहब। आप उनकी नौजवानी पर दावा उनको ही करने दें।
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हां। मुफ्ती साहब आप यंग हां पूछिए। अरे भैया सर, मेरा सवाल यह है। इनसे भी तो पूछो। जी।
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बस आपसे एक सवाल है। जैसे थीस्टों के पास अपने जो ईश्वर को मानते हैं, उनके पास अपने सोशल गेट टुगेदर्स हैं। पांच रोज आज
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क्रिसमस आने वाला है, होली है, दिवाली है, ईद है। एथिस्ट क्या ऑफर कर रहे हैं? मतलब मैं इनकी दुकान से बोर में आना चाहता हूं
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उस तरफ। पर मैं अट्रैक्ट नहीं हो पा रहा हूं। मैं सोशल गेट टुगेदर्स क्या है आपके पास?
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वो ये कह रहे हैं कि जो धार्मिक लोग हैं, अलग-अलग धर्म के लोग उनके उत्सव, त्यौहार,
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कॉग्न बहुत है। अब आपको मैं एक सुनाता हूं। यहां हिस्टोरियन भी बैठे हैं। मृदुला जी आप
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बताइएगा सही है कि नहीं? ये एक कॉन्सेंटाइन एक ग्रीक रोमन भाषा था जो
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क्रिश्चियनिटी आने के 400 साल बाद उसने डिसाइड किया कि मैं क्रिश्चियन हो जाऊंगा।
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मेरी पूरी स्टेट कैंसिल हो जाएगी। उस जमाने में ऐसे ही होता था राजा जो धर्म इख्तियार करता था वो जनता भी कर लेती थी।
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इसलिए कि वो हो गया था बैंककरप्ट और उसे जो मेडिटेरियन कोस्ट के रिच क्रिश्चियन वो
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थे मर्चेंट उससे पैसा चाहिए था। तो उसने कहा यार क्रिश्चियन हो जाओ। तो उसने अपने
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वजीर से कहा कि भाई ये हिस्ट्री है के अब हम लोग क्रिश्चियन हो जाते हैं। पहले सर
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हो जाएंगे कोई प्रॉब्लम नहीं है। लेकिन एक प्रॉब्लम ये है कि 17 दिसंबर से 25 दिसंबर
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तक जो पेगम फेस्टिवल होता जो पेग स्टेबल हो जो फेस्टिवल होता है वो बंद हो जाएगा।
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इसलिए कि हम क्रिश्चियन हो गए तो होगा नहीं। तो वो बच्चों को बहुत बुरा लगेगा। पब्लिक को बहुत डे बहुत एंजॉय करती है।
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खास तौर से 25 तो मेन डे उसने कहा हां ये तो सही कह रहे हो। ये जीसस क्राइस्ट की पैदाइश कब थी? कह साहब वो अप्रैल में थी।
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नहीं कट करो वो 25 दिसंबर को है। ये हकीकत है।
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और 400 साल बाद क्रिश्चियनिटी के अप्रैल से दिसंबर ले आए। और इसलिए कि यहां बेगम
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फेस्टिवल होता था। अब मनाते हैं आप आराम से। ये जो सारे फेस्टिवल हैं ये रिलीजन
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थे। हर एक को एक एंटरटेनमेंट डिपार्टमेंट चाहिए होता है अपनी कंपनी चलाने के लिए।
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तो ये रिलीजंस ने ये सेुलर त्यौहार थे जिन्हें रिलीजंस ने ले लिया है। ये मौसम
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के थे, फसलों के थे, किसानों के थे। उसको आपने लेके रिलीजियस रंग दे दिया। ये ये
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कोई रिलीजन से थोड़ी आए हैं। आप आप अच्छा हमें देखिए। हम तो मुद हैं। हम ईद मनाते
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हैं। हम दिवाली मनाते हैं। हम होली मनाते हैं। हम क्रिसमस मनाते हैं। मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री की सबसे बड़ी होली हमारे
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घर में। सबसे बड़ी ईद हमारे घर में होती है। वो हमारी सोशल वो है। हमारे यहां
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हेरिटेज है। ऐसा थोड़ी है कि वी विल थ्रो द बेबी अलोंग वि द वाटर। ये तो अच्छी चीज
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है। इन्हें रखो। तो बेकार है। फेंक दो। जी। हां। हेलो।
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जी। मेरा सवाल नाधवी जी से है। जैसा कि आपने बोला कि गॉड टाइम के भी परे हैं और
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गॉड इतनी कॉम्प्लेक्स चीज है कि उसे ह्यूमन माइंड समझ नहीं सकता और गॉड ने
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अर्थ पे फ्री विल भी दे दी है। तो आप अपना वक्त जाया क्यों कर रहे हैं गॉड के बारे में बात करके। अपन को तो बात करनी चाहिए
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कि सोसाइटी को बेहतर कैसे करें? मैं गॉड वही बताता है सोसाइटी को कैसे बेहतर करें? अभी मैं आपका जवाब देता हूं।
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आपने कहा कि टाइम पे वो एक्सिस्ट नहीं करता। सो
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नहीं मेरा सवाल ये है कि जैसा आपने बोला कि गॉड बहुत ही कॉम्प्लेक्स चीज है।
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मैंने कहा ही नहीं कि कॉम्प्लेक्स है ये तो आपके अल्फाज़ हैं। कॉम्प्लेक्स का लफज़ गॉड के लिए सूटेबल नहीं है। क्यों?
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क्योंकि कॉम्प्लेक्स वो चीजें होती है जो ऑब्जेक्ट हो। गॉड इज नॉट एन ऑब्जेक्ट जिसको आप इंस्ट्रूमेंट के जरिए लैबोरेटरी
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में जाकर टेस्ट करें। ओह इट्स वैरी कॉम्प्लेक्स। वो कोई कार का इंजन नहीं है। वो फिलोसफिकली
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नेसेसरी बीइंग ऐसी बीइंग है जो सिंपल बीइंग है। हां आप उसको मुकम्मल तौर पे
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उसकी तमाम हिकमतों को जान ले और हर चीज को जान ले ये पॉसिबल नहीं है। क्योंकि वो ऑल वाइज है आप ऑल वाइज नहीं है और वो खुदा है
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वो आपको सारी चीजें बता दे ये जरूरी नहीं है। मेरा सवाल ये नहीं था। मेरा सवाल यह था कि
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जब गॉड इतना परे है इस दुनिया से कि उसने अर्थ पे फ्री विल भी दी है हम सब ह्यूमंस
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की फ्री विल है और जो सोसाइटी में हो रहा है वो अपन लोग डिसाइड करेंगे तो अपन लोग डिसाइड नहीं करेंगे ना अपन लोग
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डिसाइड नहीं करेंगे गॉड जो है गॉड ने वो उसकी जात उसकी एकिस्टेंस टाइम एंड स्पेस
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से परे है लेकिन वो हमारा टेस्ट ले रहा है और उसी गॉड ने हमें बताया कि तुम्हें क्या करना है क्या नहीं करना है तो जाहिर है उस
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गॉड की बात सुनेंगे ना हम जी वो पीछे पीछे एक चश्मा लगा है जो मैम खड़ी
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है उनको दीजिए। हां आप आप जी जी बिल्कुल आएंगे। देखिए मैं कोशिश कर
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रहा हूं सब तरफ जाने की। हां उनको दीजिए माइक जी
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हेलो सर मैं ओमनी प्रेजेंट नहीं हूं। टाइम पाबंद हूं और जहां तक कोशिश कर सकता हूं करूंगा।
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जी अपना नाम बताइए। मेरा नाम उज्जुला है। मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी की एक स्टूडेंट हूं और मैं स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया से हूं। अ
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मेरा सवाल मुफ्ती जी से है कि इस हॉल के इस कमरे में बैठ के हम लोग रेप की मोरालिटी के बारे में फिलॉसफिकली बात तो
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कर सकते हैं बट असलियत ये है कि रोजमर्रा की जिंदगी में औरतें रेप के थ्रू गुजरती
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हैं। और हम लोग सिर्फ नंबर्स पे इस तरह नहीं देख सकते क्योंकि कितनी औरतें हैं इन
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कंट्रीज में जहां पे आप बता रहे हैं कि केसेस कम हैं जिनका एक्सेस है कि वो जाके केस फाइल कर सके। कितनी औरतें हैं जो
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वर्किंग जिनको काम करने की आजादी है उन कंट्रीज में। यूरोप में ये आजादी आ गई।
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यूरोप में ये रूल्स आ गए तो हम आज उसके बारे में बात कर पा रहे हैं। जी जॉब।
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आपने ये कहा कि कमरे में बंद होकर हम लोग इस पर फिलॉसोफिकली बात कर सकते हैं। लेकिन
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हकीकत में क्या हो रहा है? वो ग्राउंड लेवल पर क्या हो रहा है, जो बहुत गलत हो
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रहा है और वो सफर कर रही हैं। आई एग्री? बहुत गलत हो रहा है और जो गलत हो रहा है उसको हमें रोकना है और क्यों रोकना है वो
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गलत क्यों है? हमारे पास इसका ऑब्जेक्टिव फाउंडेशन है। इनके पास उसका ऑब्जेक्टिव फाउंडेशन नहीं है। मैं ये कहना चाह रहा
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हूं कि जहां पे भी जुल्म हो रहा है, जहां पे भी औरत पे जुल्म हो रहा है या उसकी इज्जत लूटी जा रही है या उसे तकलीफ
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पहुंचाई जा रही है। और सिर्फ औरत नहीं किसी इंसान के ऊपर भी जुल्म हो रहा है तो उसके खिलाफ खड़ा होना ये मोरालिटी हमारे
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पास गॉड के पास से आई है। वरना जावेद साहब तो कह रहे हैं कि जो है मेजॉरिटी डिसाइड करेगी। तो मेजॉरिटी तो कभी भी बदल सकती
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है। क्या आप ये थोड़ी सी आपको गलतफहमी है। मैं अगर
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मेरे जुमले से ये मजला निकला या मैंने कहा तो ये जुमला मैं वापस लेता हूं। ये मेरा मतलब ही नहीं था कि मेजरिटी डिसाइड करें।
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मेजरिटी डिसाइड करे तो दुनिया में बड़ी वैसे आपने कहा था ये जुमला। मैं मान रहा हूं।
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बाद में रिककैप कर लेंगे। अरे एक सेकंड मैं अपनी एक्सप्लेनेशन दे रहा हूं। मुनासिब बात ये है कि हम सब के सब दिल में
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जानते हैं। कि क्या अच्छा है क्या बुरा है हमें पता है अच्छी तरह से जो लोग बुरे काम करते हैं उन्हें भी मालूम अच्छा अच्छा
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यही तो सवाल था हजरत कि फिर ये मोरालिटी आई कहां से क्रॉस एग्जामिनेशन हां जी हां मोरालिटी साथ रहने की डिजायर से आई है।
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यानी साथ रहकर जो कुछ कह दे जो कुछ कर दे वो हो जाएगा। नहीं तो आप कायदे से रहित सकते हैं जब तक लोगों
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में मोरालिटी हो। वरना कॉस हो जाएगा। ये आपको कैसे पता? जी। हमने देखा ना जहां रियलिटी ठिकास हो
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गया हम देखते हैं कहां पे भाई दुनिया में काम क्यों
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कहीं पे अगर गलत हो रहा है इस बहस को आप सर आप एपिस्टमोलॉजी की बात कर रहे हैं मैं
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ऑनोलॉजी की बात कर रहा हूं मैं इस दोनों लोगों को चाय से होस्ट करूंगा वहां पे क्रॉस एग्जामिनेशन कर लीजिए अभी ऑडियंस का
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हक मार रहे हैं आप लोग भाई जस्ट लोग हैं आप लोग और ये भाई ये हां उधर उधर आएंगे उधर सर आएंगे आएंगे
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सर सर मेरा नाम लख उर रहमान है और मैं अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का स्टूडेंट हूं। और जहां तक मुझे पता है कि सर यू आर
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आल्सो प्रोडक्ट ऑफ़ अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी। मैं भी उसी चमन का बुलबुल हूं। हां सर। तो बड़ी खुशी हुई मुझे जान के कि
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मैं आपसे मिलूंगा। सवाल सर मेरा सवाल ये है कि सर सैयद अली रहमा का नजरिया ये था के खुदा के वजूद को अकल
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के दायरे में रह के तलाश करना ना के पूरी तौर से उसका इंकार कर देना। सर हाउ विल यू
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डिफाइन इट? नहीं नहीं तो यह तो आप इन्हें बताइए सवाल है कि खुदा का वजूद साबित कर
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रहे हैं। तो सर आपने इंकार कर रखा है। इस वजह से मेरा क्वेश्चन उन्होंने यही सर एक सेकंड सर सैयद ने यही
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कहा है ना कि अकल से आप खुदा के वजूद को साबित नहीं कर सकते। यही कहा ना भाई
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वो उन्होंने कहा है कर सकते हैं और वो कर दिया गया आज। वो तलाश करना या साबित करना अक्ल से ताल्लुक
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अकल से नहीं। अरे सवाल तो सुन लीजिए। जी अक्ल से नहीं हो सकता। यही कहा ना आपने?
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अक्ल से हो सकता है। अरे वो यही कह रहे हैं भाई आप बता रहे हो सकता है। वो तो कुछ और मेरा सवाल ये है कि
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आप अगर सर देखो नौजवान फ़ इतनी कमाल की यूनिवर्सिटी है ये। अरे भाई दे दो ना। अरे भाई मेरी बात सुनो।
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माइक पे बोलो ताकि जो लाखों लोग देख रहे हैं। माइक दे दो ना। अरे देंगे ना माइक। तुम ठहरो तो। हां सर
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मेरा सवाल यह था के सर सैयद अल रहमा का एक नजरिया था अपना के खुदा का जो वजूद है
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उसको अकल के दायरे में रह के तलाश करना है ना कि पूरे तौर से इंकार कर देना है ये ये
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उनका कांसेप्ट था लेकिन मेरा सवाल ये है कि आप इसको कैसे डिफाइन करते हैं एक्सप्लेन कैसे करेंगे मैं आपसे जानना
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चाहता हूंकि यू आर द प्रोडक्ट ऑफ अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी मुझे अली मुझे अक्ल के दायरे में मैंने
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बहुत तलाश की मुझे मिला नहीं हां ये इधर उधर वो चश्मा लगाए जो हां उनको
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दे दीजिए जी जी फटाफट पूछिए बस पांच मिनट है पांच मिनट में खत्म हो रहा है हां
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सलाम वालेकुम मुफ्ती साहब एंड मेरा सवाल मेरा सवाल जावेद अख्तर साहब से क्या नाम है आपका
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अरे भैया मुझे काहे पूछ रहे हो यार फैज फैज फैज फैज पूछिए फैज साहब तो मेरा सवाल ये है कि अभी जो एथियस्ट है
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वो प्रॉब्लम ऑफ इविल आर्गुमेंट यूज कर रहे हैं अगेंस्ट मुस्लिम्स राइट कि इस दुनिया में इतना सारा ईवल है और अगेंस्ट मुस्लिम
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तो यहां अगेंस्ट थिएस्ट अगेंस्ट थिएस्ट हां थोड़ा सा करेक्ट कर लीजिए भाई। पूरी मशक्कत ही इसी बात की थी कि किसी एक मज़हब पे बात ना
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टिके। जी। तो बेसिकली ये आर्गुमेंट ऐसा है कि इस दुनिया में इतना ज्यादा इवल एक्सिज़िस्ट
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करता है और अगर एक ऑल गुड गॉड है तो वो रोकता क्यों नहीं है? लेकिन इस सवाल में एक हिडन असंप्शन ये है कि इस दुनिया में
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ईवल एक्सिस्ट करता है। अब एथियस्ट ये कैसे ऑनंटोलॉजिकली प्रूव कर सकते हैं कि इस दुनिया में ईवल एक्सिस्ट करता है। मैं
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आपको बताता हूं थोड़ा सा समझा। नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, सर, सर। मैं मेरा सुनिए। नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, प्लीज डोंट डू। आई वांट टू
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एक्सप्लेन ऑनलॉजी नहीं नहीं हम समझ गए सर। इनको आप जवाब देने दीजिए। अच्छा सवाल पूछ लूं मैं। अभी तक क्या था?
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वो मैं मैं थोड़ा सा ऐड ऑन कर लेता हूं। तुम गुरु तो हम जब इसका राउंड 13 करेंगे ना तब तुमको स्टेज पे बिठाएंगे।
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जी जी। तो हां जल्दी से। तो देखिए एथिज्म एथिज्म के हिसाब से सब कुछ रैंडमली बन गया
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है। सब कुछ एटम्स और मॉलिक्यूल्स हैं। एक पत्थर में और मुझ में सिर्फ इतना फर्क है कि हम लोग एटम्स और मॉलिक्यूल्स का अलग-अलग रिअरेंजमेंट है। अब एक पत्थर को
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कोई इंसान तलवार से दो टुकड़ों में काट दे या मुझे। अकॉर्डिंग टू एथिज्म इट इज़ सेम देयर इज़ नो इवल एंड गुड अकॉर्डिंग टू
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एथिज्म। जी अच्छा फैज साहब का सवाल यह है कि कोशिश
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भी करते तो इससे गलत सवाल नहीं कर पाते। एक लाइफ फॉर्म है और लाइफ फॉर्म में
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फीलिंग्स है। मतलब लाइफ फॉर्म सुनता है, देखता है, टेस्ट कर सकता है, फील कर सकता
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है। तो उसकी जो ये जो क्वालिटी इस बबल में आ गई है कि वो जानवर में भी है, इंसान में
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भी है। तो जाहिर है कि उसे कोई तकलीफ पहुंचेगी तो क्योंकि उसके पास वो सेंसिटिविटी है तो मैं करेगा। पत्थर में
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वह सेंसिटिविटी नहीं है। तो यह क्या सवाल हुआ कि अगर पत्थर को काटा तो पत्थर को तकलीफ नहीं होती। तो आपको काटे तो आपको
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क्यों तकलीफ होगी? बैठ जाइए। जी हां अगला सवाल। हां पूछिए पूछिए पूछिए।
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जी जावेद अख्तर साहब। अरे भैया सब आप लोग मुफ्ती साहब को छोड़
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रहे हैं। वो मेरे ही पीछे पड़े हैं। क्या? चलो बोलो भाई। यू यू आस्क हाउ गॉड कैन एक्सिस्ट व्हेन
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चिल्ड्रन डाई एंड गाज़ा। हां? यू आस्क्ड हाउ गॉड कैन एक्सिस्ट व्हेन चिल्ड्रन डाई इन काज़ा एंड यू आल्सो मेंशन
1:47:59
द राइज़ ऑफ़ एथिज्म इन यूरोप बट द सेम इवेंट्स आल्सो आर लीडिंग मेनी एथिस्ट एंड
1:48:04
नॉन बिलीवर्स टू टर्न टुवर्ड्स फेथ हाउ डू यू इंटरप्रेट दिस कंट्राडिक्शन वेयर
1:48:10
सफरिंग पुशेस सम अवे फ्रॉम गॉड येट ब्रिंग्स अदर्स क्लोज़र टू बिलीफ आपको एक
1:48:16
बात बताऊं दुनिया परफेक्ट तो कहीं भी नहीं है हर जगह कुछ खामियां है बेटा एक मिनट आप
1:48:22
ही को कहेंगे देखो वो तो कुछ खामियां कमजोरियां खराबियां सब जगह
1:48:28
है लेकिन अगर देखोगे ईमानदारी से कि दुनिया सबसे ज्यादा मुजब कहां है एक आम
1:48:34
शहरी को कहां हुकूक हासिल है वो बोल सकता है अपनी मर्जी से काम कर सकता है अपनी
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मर्जी से राय दे सकता है हुकूमत के खिलाफ बोल सकता है बरसरे इख्तेदार लोगों के बारे
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में बोल सकता है सरमायादारों के खिलाफ बोल सकता है तो आपको ये स्कडीनेवियन कंट्रीज
1:48:52
में मिलेगा। वेस्टर्न यूरोप में मिलेगा। मैं नहीं कह रहा वो परफेक्ट है। बिल्कुल नहीं। वहां बहुत खराबियां भी है। परफेक्ट
1:48:58
तो कोई नहीं। लेकिन जिनजिन मुल्कों में लैटिन अमेरिका देखो, गल्फ देखो। वहां पर
1:49:05
आपको ये जरूर है कि रेप नहीं होते होंगे। रेप की जरूरत क्या है? भाई उसको तो खरीद लो। घर में रखो। सड़क पे रेप करने की क्या
1:49:12
जरूरत है? मगर सुनिए सुनिए सुनिए। मगर हकीकत ये है कि वहां शख्स आजादी राय देने
1:49:20
की बोलने की नहीं है। जी ये एक आखिरी सवाल मुफ्ती साहब से हां
1:49:25
मैम इनको माइक दीजिए। शुक्रिया मेरा नाम मनीषा है। मैं हरियाणा
1:49:31
से आई हूं। मैं मुफ्ती साहब से एक बात पूछना चाहती हूं। आप बार-बार जावेद साहब को कंट्राडिक्ट तो कर रहे हैं कि आपने ये
1:49:37
कहा ये कहा लेकिन आप भी एजम्पशनंस के बेसिस पे बात कर रहे हैं। आपने खुदा के होने का कौन सा प्रूफ पेश किया है खुदा की
1:49:46
एक्सिस्टेंस का। अब मां इस सवाल को अलग रहने दीजिए। कौन एथिस्ट है, कौन नहीं है? और दूसरी बात जो आपने एक छोटी सी कही थी
1:49:52
के ये फ्री विल का इस्तेमाल करता है इंसान अपनी लेकिन उस फ्री विल का इस्तेमाल में
1:49:57
मतलब खुदा ने ये दे दी सबको ये इजाजत के वो कितना घिनौनापन और कितने ज्यादा खराब
1:50:04
से खराब तरीके इस्तेमाल कर सकता है जब आप सुनते हैं आप फ्री विल को मानती है ना या कहती है कि फ्री विल नहीं है
1:50:11
है ना मानती है ना तो अब आपके पास इसका कोई एक्सप्लेनेशन नहीं है कि अगर एक इंसान
1:50:18
उस फ्री विल का इस्तेमाल करके करके गलत काम कर रहा है और बच के अच्छी जिंदगी गुजार के निकल जा रहा है। उसका कोई
1:50:23
रिकमेंस नहीं है। हमारे वर्ल्ड व्यू में जो इंसान गलत काम कर रहा है उसको भी
1:50:30
रिकंपैेंस यानी उसका बुरा बदला मिलना है और जो सही काम कर रहा है उसको सही बदला मिलना है। लिहाजा जो फ्री विल है वो इस
1:50:38
तरीके से है कि एक लिमिटेड टाइम तक खुदा ने मोहलत दी है। ऐसा नहीं कि छूट दे दी। जो करना है करते रहो हमेशा। वक्त आएगा जब
1:50:46
एग्जाम का टाइम खत्म होगा तब रिजल्ट आएगा। दौराने एग्जाम जबरदस्ती आपको नहीं बताया जाएगा।
1:50:51
अरे भाई एक मिनट एक सवाल मुफ्ती साहब से मेरा मुफ्ती साहब से एक्बसे
1:51:04
मैं मुफ्ती साहब एक ही सवाल करता हूं। के अगर जो हो रहा है फ्री विल से हो रहा
1:51:10
है और एक दिन बरोजे कयामत इंसाफ होगा महसर में वगैरह-वगैरह।
1:51:16
तो दुआ क्यों मांगते हैं लोग? दुआ मांगते हैं इसके मतलब है अभी भी उसने यह
1:51:22
डिपार्टमेंट रखा है कि मैं रोजमर्रा की जिंदगी में इंटरव्यू ही कैन
1:51:27
तो तुम कैन हो तुम मुझे नौकरी दिला देते हो। मेरे बेटे को ग्रीन कार्ड दिला देते
1:51:32
हो और 45,000 बच्चे मरते उन्हें रोकते नहीं हो। नहीं तो क्या आप यह कह रहे हैं कि इस दुनिया में जालिमों को कभी पकड़ ही
1:51:39
नहीं होती है। अरे जो भी पकड़ होगी वो बच के रोते हैं। बिल्कुल देखिए मैंने अपने ओपनिंग
1:51:44
स्टेटमेंट में यही कहा था कि जनाब जावेद साहब सिर्फ इमोशनल आर्गुमेंट है। दिस एन इमोशनल आर्गुमेंट ये छोटे इसके पीछे
1:51:53
इसके पीछे का रीज़न मैंने बताया क्या है? इसके पीछे का क्या है? मैंने बताया। मंच से आप लोगों को सज्जनों इसलिए कह रहा
1:52:00
हूं ताकि थोड़ा सा आपके कॉन्शियस पे जोर रहे कि आपको आर्डर बचा के रखना है। वक्त
1:52:06
तय हुआ था। यह वक्त पूरा हुआ। आपने इतने धैर्य पूर्वक सुना। मैं आप सबका बहुत-बहुत
1:52:11
शुक्रगुजार हूं। यदि इन दोनों विद्वानों की इच्छा होगी तो कभी हम इस बातचीत का
1:52:17
राउंड टू राउंड थ्री यही तो देखिए खूबी है इंसान की कि बहस मुबासे में वो पड़ा रहता है। आप लोगों ने बड़े धैर्य का परिचय
1:52:23
दिया। बहुत-बहुत शुक्रिया। इसी के साथ ये बातचीत यहां पे समाप्त। आप लोगों को मैं एक बात बता दूं। ये सारी बहस हो गई। अब मुफ्ती साहब और बड़े मुफ्ती
1:52:31
साहब इन सब के साथ में खाना खाने वाला हूं। अच्छा।
1:52:45
बहुत बढ़िया
1:53:00
बहुत अच्छे से पहले आगे आगे
1:53:31
सर हेलो
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