0:00
क्या इस्लाम में वंदे मातरम का कहना जायज
0:03
है या नहीं? वंदे मातरम का मतलब क्या है?
0:07
क्या यह सिर्फ एक देशभक्ति तराना है?
0:10
मुसलमान क्या कर सकता है?
0:16
अस्सलाम वालेकुम व रहमतुल्लाह व बरकातहू।
0:21
मोहतरम हजरात उम्मीद है आप सब खैरियत व
0:25
आफियत से होंगे। आज हम एक बहुत ही अहम
0:30
मुद्दे पर बात करेंगे। मुद्दा यह है कि
0:33
क्या इस्लाम में वंदे मातरम का कहना जायज
0:37
है या नहीं? वंदे मातरम का मतलब क्या है?
0:41
क्या यह सिर्फ एक देशभक्ति तराना है या
0:45
फिर इसमें कुछ ऐसी बातें भी हैं जो सरासर
0:49
इस्लामी तालीम से टकराती है। तो आइए आज हम
0:53
इसको पूरी तफसील से समझते हैं। तो सबसे
0:56
पहले हम वंदे मातरम का असल मतलब समझते
1:00
हैं। वंदे का मतलब है वंदना करना, पूजा
1:04
करना, इबादत करना, नमन करना। मां तरफ यानी
1:10
माता को मां को। इस पूरे वाक्य का मतलब यह
1:14
है कि हे मां हे माता मैं आपकी पूजा करता
1:19
हूं। मैं आपको प्रणाम करता हूं। आपकी
1:22
वंदना करता हूं। इस गीत की कुछ लाइन में
1:26
ऐसा क्या कहा गया है जो सरासर इस्लामी
1:30
तालीम के खिलाफ है? बकिम चंद्र
1:33
चट्टोपाध्याय के इस मूल गीत में कुछ लाइन
1:36
इस तरह है जैसे एक लाइन में कहा गया है तय
1:39
ही दुर्गा दश प्राण धारिणी यानी तुम ही
1:43
दुर्गा हो जो द हथियार धारण करने वाली हो
1:46
तय ही कमला दल कमल विहारिणी यानी तुम ही
1:51
कमल पर विराजमान लक्ष्मी हो तय ही सरस्वती
1:56
वाणी विद्या दायिनी यानी तुम ही वाणी और
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विद्या देने वाली सरस्वती हो। इस गीत में
2:04
भारत को देवी के रूप में पेश किया गया है।
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आइए अब हम जानते हैं कि इस्लाम की नजर में
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इस गीत को पढ़ने में परेशानी कहां है। तो
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याद रखिएगा कि इस्लाम का साफ ऐलान है कि
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इबादत सिर्फ एक अल्लाह की होनी चाहिए। एक
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अल्लाह के सिवा किसी इंसान, किसी जानवर,
2:25
किसी जगह या मुल्क की इबादत करना यह सरासर
2:29
इस्लाम के खिलाफ है और शर्क है। और
2:32
क्योंकि इस गीत में मुल्क को देवी के रूप
2:36
में पेश किया गया है। इसलिए उसको पढ़ना और
2:40
उसके हिसाब से चलना और उसको कुबूल करना यह
2:44
सरासर इस्लामी तालीम के खिलाफ है। इस्लाम
2:48
में सजदा, नमन और प्रणाम सिर्फ एक अल्लाह
2:52
के लिए होना चाहिए। इसके अलावा किसी के
2:55
लिए नहीं है। इस गीत में देश को ही देवता
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मान लिया गया है। और इस्लाम में देवी
3:02
देवता की कोई जगह नहीं। इसलिए उसको प्रणाम
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करना, उसको नमन करना, यह सरासर गलत है। जो
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कि इस्लाम के खिलाफ है। इसका मतलब यह नहीं
3:13
कि मुसलमान मुल्क से मोहब्बत नहीं करते।
3:16
इस्लाम मुल्क से मोहब्बत देश से मोहब्बत
3:20
नहीं सिखाता। इस्लाम मुल्क से जरूर
3:23
मोहब्बत सिखाता है और यह नबी पाक
3:26
सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के तरीके से पता
3:29
चलता है जो कि बिल्कुल जायज है और हम भी
3:32
करते हैं। तो मुल्क से मोहब्बत वतन से
3:35
मोहब्बत ये इस्लामिक तरीके से होना चाहिए
3:38
ना कि किसी गैर तरीके से गैर जुमलों से।
3:42
मुसलमान क्या कर सकता है? मुसलमान मुल्क
3:45
से मोहब्बत कर सकता है। कौमी तराना जो
3:48
किसी इस्लामी तालीम के खिलाफ ना हो, हलाल
3:51
हो तो वो तराना पढ़ सकता है। मुल्क वालों
3:54
से मोहब्बत कर सकता है। मुल्क और देश की
3:57
तरक्की के लिए दुआएं कर सकता है। लेकिन
4:00
किसी शरकिया कलाम नहीं बोल सकता। किसी
4:03
गैरुल्लाह की इबादत पूजा उसका नमन नहीं कर
4:07
सकता। ना अपने अमल से ना अपने जुमलों से।
4:11
रसूल्लाह सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम की
4:13
हदीस से पता चलता है कि मुल्क और वतन से
4:17
ये फितनी मोहब्बत जायज है। मदीना की तरफ
4:20
हिजरत के मौके पर रसूल्लाह सल्लल्लाहहु
4:23
अलैहि वसल्लम ने मक्का की तरफ मुखातिब
4:26
होकर यह फरमाया था ए मक्का तू कितना
4:30
पाकीजा है और मेरा महबूब है। अगर मक्का
4:34
वाले मुझे ना निकालते तो मैं तुझे छोड़कर
4:37
कहीं और नहीं रहता। मदीना में हिजरत के
4:41
बाद रसूल्लाह सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने
4:43
यह दुआ फरमाई अल्लाह हब इल मदीना कमा हब
4:48
इना मक्का वशद कि ऐ अल्लाह कि हमारे दिल
4:52
में मक्का से ज्यादा मदीना की मोहब्बत डाल
4:56
दीजिए। एक रिवायत में है कि जब रसूल्लाह
4:59
सल्लल्लाहहु अलैह वसल्लम किसी सफर से
5:02
मदीना की तरफ वापस आते तो जब मदीना के
5:05
रास्ते और मकानात नजर आते तो मदीना की
5:09
मोहब्बत में आप अपनी सवारी को तेजी से
5:12
दौड़ाते। एक रिवायत में है कि जब हजरत
5:15
खदीजा रदी्ला अन्हा हुजूर पाक सल्लल्लाहु
5:18
अलैह वसल्लम को लेकर वका इब्न नफल के पास
5:21
पहुंचा तो वका इब्न नफल ने कहा कि आपकी
5:25
कौम आपको झुठलाएगी आपको अज़यत देगी और आपको
5:30
इस शहर से निकाल देगी। तो इस पर रसूल्लाह
5:33
सल्लल्लाहहु अलैह वसल्लम ने मक्का से जिला
5:36
वतनी मक्का से निकल देने वाली बात पर
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ज्यादा दुख व परेशानी का इज़हार किया कि
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बाकी मुश्किलात तो सह लिए जाएंगे पर अपने
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शहर से निकाल देना इस तकलीफ को सहना बहुत
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ही मुश्किल होगा। तो प्यारे दोस्तों इन सब
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अदीस और रिवायत से हमें मालूम हुआ कि देश
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से मुल्क से मोहब्बत करना यह एक फितरी चीज
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है और इंसान फितरी तौर पर मजबूर रहता है।
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इसलिए वतन से मोहब्बत करना जायज है और
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अपनी मोहब्बत का इजहार के लिए किसी खास
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तराना और गाना गाने की जरूरत नहीं।
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मोहब्बत तो दिल से होती है और वह भी ऐसे
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तराना जो कि सरासर इस्लाम के खिलाफ है।
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इस्लामी अकायद और तालीमों के खिलाफ है। इस
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तरह के अल्फाज़ कहना इस तरह के तराना गाना
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जो बिल्कुल इस्लाम के खिलाफ हो, शरीयत के
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खिलाफ हो, नाजायज और हराम हो। इस पर अगर
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हमें मजबूर भी किया जाए तो हमें गवारा
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नहीं। अल्लाह हम सबको सही समझ-बूझ अता
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फरमाए और सही रास्ते पर सही अमल करने की
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तौफीक अता फरमाए। आमीन।