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ज़हर का वक्त कब से शुरू होता है और कब
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खत्म होता है? ये सवाल या सूरज का ढलना
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क्या है? उसे समझते हैं। दोपहर में किस
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वक्त नमाज पढ़ना मना है?
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अस्सलाम वालेकुम व रहमतुल्लाह व बरकातहू।
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मोहतरम हजरात उम्मीद है आप सब खैरियत से
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होंगे। आज हम जानेंगे कि ज़हर का वक्त कब
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से शुरू होता है और कब खत्म होता है। तो
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आइए जानते हैं। याद रखिएगा ज़हर का वक्त
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ज़वाल यानी सूरज के ढलने से शुरू होता है।
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अब यह ज़वाल या सूरज का ढलना क्या है? उसे
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समझते हैं। हम जानते हैं कि सूरज पूरब से
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निकलता है। पश्चिम की तरफ डूबता है। अब यह
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निकलने और डूबने तक जितना वक्त है इस पूरे
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वक्त को अगर हम दो हिस्सों में बांटें तो
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बीच का जो वक्त है उसको नुस्फ नहार यानी
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दिन का बीच वाला हिस्सा या इस्तवा शमस कहा
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जाता है। इसी के थोड़ी देर बाद जब सूरज
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पश्चिम की तरफ थोड़ा सा आगे बढ़ जाता है।
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इसे ही ज़वाल कहते हैं। यानी सूरज का ढलना
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कहते हैं। और इसी से ज़हर का वक्त शुरू
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होता है। आइए अब हम जानते हैं कि दोपहर
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में किस वक्त नमाज़ पढ़ना मना है। जब ज़वाल
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होता है यानी सूरज ढल जाता है तो ज़हर का
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वक्त शुरू हो जाता है। ये इस्तवा शम्स
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यानी दिन का बीच वाला हिस्सा ये बहुत थोड़ा
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सा होता है। लेकिन फिर भी उससे पहले और
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उसके बाद 5 मिनट एहतियात के तौर पर नमाज
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लोगों में यह बात मशहूर है कि ज़वाल शुरू
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होने से नमाज पढ़ना मकरू है। हालांकि यह
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बात गलत है क्योंकि ज़वाल होने से ज़हर का
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वक्त शुरू होता है। ज़वाल से पहले नमाज़
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पढ़ना मकरूह है। आइए अब हम जानते हैं कि
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ज़हर का वक्त कब खत्म होता है? यानी कब तक
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ज़हर का वक्त बाकी रहता है। इसे आसान भाषा
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में समझने के लिए यह याद रखें जब सूरज
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निकलता है तो हर चीज का एक साया दिखाई
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देता है। जब सूरज आगे बढ़ता है तो वो साया
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कम होता जाता है। फिर जब सवाल होता है
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सूरज ढलता है तो यही साया बढ़ता जाता है।
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और बढ़ते-बढ़ते उसका एक गुना और दो गुना
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डबल हो जाता है। जब यह साया ने असल साया
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के अलावा डबल हो जाता है, तो ज़हर का वक्त
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खत्म हो जाता है और असर का वक्त शुरू होता
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है। यह इमाम अबू हनीफा रहम्लाह के नजदीक
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है। और इसी पर हमारा अमल है। अगर किसी ने
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अब तक नमाज नहीं पढ़ी है, तो इस वक्त तक
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नमाज़ पढ़ सकता है। यह ज़हर की नमाज़ अदा